Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya | भ्रमरगीत सार की व्याख्या

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya – Ramchandra Shukla In Hindi : दोस्तों ! हम सूरदास जी द्वारा रचित और रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार ” का अध्ययन कर रहे हैं। पिछले नोट्स में हमने इसके शुरूआती 03 पदों का विस्तृत अध्ययन कर लिया था। आज हम इसके अगले #4-6 पदों की शब्दार्थ सहित विस्तार से व्याख्या करने जा रहे है। तो चलिए शुरू करते है :

Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार की व्याख्या [#4-6 पद]

Ramchandra Shukla‘ Bharmar Geet Saar Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित कृति “भ्रमरगीत सार” के अगले #4-6 पदों की व्याख्या इसप्रकार से है :

#पद : 4.

Ramchandra Shukla Ke Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya – in Hindi

हरि गोकुल की प्रीति चलाई
सुनहु उपंगसुत मोहिं न बिसरत ब्रजवासी सुखदाई।।

यह चित होत जाऊँ मैं, अबही, यहाँ नहीं मन लागत।
गोप सुग्वाल गाय बन चारत अति दुख पायो त्यागत।।

कहँ माखन-चोरी ? कह जसुमति ‘पूत जेब’ करि प्रेम।
सूर स्याम के बचन सहित सुनि व्यापत अपन नेम।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. प्रीति चलाई प्रीति-प्रसंग की चर्चा की
02. बिसरत भूलना
03. चित होत मन करता है
04. नेम नियम पालन करना

व्याख्या :

श्री कृष्ण ने उद्धव से ब्रजवासियों के प्रेम से संबंधित चर्चा चलाई है। श्री कृष्ण कहते हैं कि हे उद्धव ! सुनो, मुझे ब्रजवासी और उनका मेरे प्रति प्रेम भूलाये नहीं भूलता। वे सदा ही मेरे मन में बसे रहते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने प्रेम से मुझे सदा सुख पहुंचाया है, जिससे मेरा मन यहां नहीं लगता है। मेरी इच्छा होती है कि मैं अभी वहां चला जाऊं।

वहां मैं गोप और ग्वालों के साथ वन में गाय चराने जाया करता था। उनसे बिछड़ते वक़्त मुझे बहुत दु:ख हुआ था और आज भी मुझे ब्रज की अनेक बातें स्वत: ही स्मरण हो आती है। अब ना तो वह माखन चोरी है और ना ही कोई स्वजन है, जो माता यशोदा के समान आग्रह करके यह कहे कि “बेटा ले खा ले !”

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

सूरदास जी कह रहे हैं कि श्री कृष्ण के प्रेमसिक्त वचनों को सुनकर भी उद्धव अपने नियम साधना में निमग्न ही रहे। उनका मन अपने योग मार्ग के विधि-विधानों में डूबा रहा अर्थात् उद्धव ने श्री कृष्ण के इस प्रेम मार्ग को महत्व न देकर ज्ञान साधना को ही महत्व दिया। योगमार्गी उद्धव का प्रेम-मार्ग की ओर ध्यान ना देना स्वभाविक ही था, क्योंकि उनकी दृष्टि में प्रेम-भावना सांसारिक मोह मात्र ही था, जिसका तिरस्कार करना ही उचित है।

“हरि गोकुल की प्रीति चलाई….…” पंक्ति से यह ध्वनित हो रहा है कि श्री कृष्ण प्रेम-प्रसंग की चर्चा चलाकर उद्धव के मन की थाह ले रहे हैं। इसके माध्यम से श्री कृष्ण उद्धव को यह भी बता देना चाहते हैं कि ब्रज में व्यर्थ ही योग मार्ग की चर्चा ना चलाये, वहां इसका कोई परिणाम नहीं मिलेगा। उक्त पंक्तियों से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण ब्रज को भूले नहीं, माता यशोदा के स्नेह-दुलार के लिए उनका हृदय बार-बार व्याकुल हो उठता है। वे उन्हें भूलने में असमर्थ है।

#पद : 5.

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya with Hard Meaning in Hindi

जदुपति लख्यो तेहि मुसकात
कहत हम मन रही जोई सोइ भई यह बात।।

बचन परगट करन लागे प्रेम-कथा चलाय।
सुनहु उध्दव मोहिं ब्रज की सुधि नहीं बिसराय।।

रैनि सोवत, चलत, जागत लगत नहिं मन आन
नंद जसुमति नारि नर ब्रज जहाँ मेरो प्रान।।

कहत हरि सुनि उपंगसुत ! यह कहत हो रसरीति।
सूर चित तें टरति नाही राधिका की प्रीति।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. जदुपति कृष्ण
02. लख्यो देखा
03. तेहि उसको
04. मुसकात मुस्कुराकर
05. जोई जो
06. रैनि रात्रि
07. आन अन्यत्र

व्याख्या :

श्री कृष्ण उद्धव से ब्रज के विषय में बातचीत कर रहे हैं। श्री कृष्ण की प्रेम दुर्बलता को देखकर उद्धव मुस्कुरा पड़ते हैं। यह मुस्कुराहट उद्धव की सैद्धांतिक विजय की अभिव्यक्ति थी, जिसे श्री कृष्ण ने देख लिया। जिसके फलस्वरूप श्री कृष्ण ने उसे उछाल देने के लिए अपने प्रेम का मोह और भी खोल कर रख दिया।

वे अपने मन में सोचने लगे कि हमने उद्धव के विषय में जो धारणा निश्चित की थी, वह असत्य प्रमाणित हो रही है, क्योंकि उसका यह मुस्कुराना स्पष्ट करता है कि वह दृढ योगमार्गी है। इतने पर भी उन्होंने अपने मनोभावों को मन में ही दबाये रखा और पुनः ब्रजवासियों के प्रेम की चर्चा प्रारंभ कर दी।

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

वे कहने लगे कि हे उद्धव ! मैं ब्रज की यादों को भुला पाने में सर्वथा असमर्थ हूं। रात्रि में सोते समय, दिन में जागते समय और इधर-उधर घूमते समय मैं ब्रज की स्मृतियों में ही डूबा रहता हूं और मेरा मन अन्यत्र कहीं भी लगता नहीं है। वहाँ ब्रज में नंद बाबा, यशोदा माता तथा अन्य नर – नारियां अर्थात् गोप – गोपिकाएं निवास करती है, वहीँ मेरे प्राण रहते है। मैं हमेशा ही उनकी स्मृति में खोया रहता हूं। ऐसा लगता है कि इनके अतिरिक्त मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं रहा है।

हे उद्धव ! मैं तुम्हारे सम्मुख प्रेम की रीती का वर्णन करता हूं। मेरे हृदय से राधा की प्रीति क्षण भर के लिए भी दूर नहीं होती है। कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम की रीति ही ऐसी होती है कि प्रेम में निरंतर अपने प्रिय के ध्यान में निमग्न रहते हैं। मैं यहां राधा से दूर हूँ, किंतु फिर भी मैं उसे क्षण भर के लिए भी भुला नहीं पाता हूं। इस पद में भी श्री कृष्ण, राधा को संपूर्ण गोपिकाओं में अनन्य घोषित करते हुए उनके प्रति अनन्य प्रीति का वर्णन कर रहे हैं।

#पद : 6.

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya Bhavarth or Mool Bhaav in Hindi

सखा ? सुनों मेरी इक बात।
वह लतागन संग गोरिन सुधि करत पछितात।।

कहाँ वह वृषभानुतनया परम् सुंदर गात
सरति आए रासरस की अधिक जिय अकुलात।।

सदा हित यह रहत नाहीं सकल मिथ्या-जात
सूर प्रभू यह सुनौ मोसों एक ही सों नात।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. लतागन लताओं का समूह
02. वृषभानुतनया राधा
03. गात शरीर
04. सरति याद
05. रासरस आनंद-विहार
06. जिय हृदय
07. अकुलात व्याकुल होना
08. सकल समस्त
09. मिथ्या-जात मिथ्या भावना के उत्पन्न भ्रमरूप
10. नात नाता या संबंध

व्याख्या :

श्री कृष्ण उद्धव से ब्रज की चर्चा कर रहे हैं और राधा के प्रति अपने प्रेम भावना व्यक्त करते हुए कह रहे हैं कि हे सखा ! मेरी एक बात सुनो, मैंने ब्रज की इन लताकुंजो में गोपियों के साथ अनेक प्रकार की रासलीलायें की है। उन मधुर क्षणों को मैं याद करता हूं और पश्चाताप करता रहता हूं कि उन्हें और उनके साथ जो भी आनंद की घड़ियां मैंने व्यतीत की है, उन सब को छोड़कर मैं यहां क्यों आ गया ?

वह सुंदर और आकर्षक शरीर वाली वृषभानुतनया अर्थात् राधा यहां कहां है ? जब मुझे राधा और गोपिकाओं के साथ किए गये आनंद-विहार की स्मृति हो आती है तो मेरा हृदय बहुत ही व्याकुल हो उठता है।

Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya

श्री कृष्ण की यह प्रेम रस पूर्ण बातें सुनकर ज्ञानमार्गी उद्धव उनसे कह रहे हैं कि मनुष्य का प्रेम सदैव एक सा नहीं रहता और ना ही स्थिर रहता है। मिथ्या संसार के प्रति उत्पन्न प्रेम भ्रम मात्र है। हे श्री कृष्ण ! आप मेरी एक बात सुनिये कि केवल एक ब्रह्म से संबंध रखिये, क्योंकि वही नित्य, स्थायी और सर्वत्र विद्यमान है तथा शाश्वत व सत्य है।

ज्ञान के प्रतिनिधि उद्धव श्री कृष्ण के प्रेम का उपहास करते हुए ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्यं” के सिद्धांत का प्रतिपादन कर रहे हैं। यही विवाद आगे चलकर गोपी-उद्धव संवाद में परिवर्तित होता है।

“मेरी इक बात…….” पंक्ति में श्री कृष्ण उद्धव का सारा ध्यान अपने ऊपर केंद्रित करना चाहते हैं। “एक ही सों नात……” पंक्ति में इसका गहनता से उत्तर भी दिया गया है। श्री कृष्ण की दृष्टि में प्रेम ही सब कुछ है और उद्धव की दृष्टि में ब्रह्म सत्य है, बाकी सब कुछ मिथ्या है।

तो दोस्तों ! ये थी Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya | भ्रमरगीत सार के अगले कुछ पदों की व्याख्या। उम्मीद है कि आपको अच्छे से समझ आया होगा। फिर मिलते है, आगे के कुछ महत्वपूर्ण पदों की व्याख्या के साथ !

एक गुजारिश :

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