वर्ण व्यवस्था पर निबंध

वर्ण व्यवस्था पर निबंध | Essay on Varna System in India in Hindi

वर्ण व्यवस्था पर निबंध : हिन्दू सामाजिक संगठन में वर्णाश्रम व्यवस्था का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है । इसके अन्तर्गत दो प्रकार के संगठन थे- वर्ण तथा आश्रम । इनका सम्बन्ध मनुष्य की प्रकृति तथा उसके प्रशिक्षण से था और इस प्रकार ये हिन्दू सामाजिक संगठन के आधार स्तम्भ हैं । अग्रलिखित पंक्तियों में हम वर्ण व्यवस्था पर निबंध, इनकी उत्पत्ति तथा विकास का विवरण प्रस्तुत करेंगे ।

वर्ण व्यवस्था पर निबंध | Essay on Varna System in India in Hindi.

Essay # 1. वर्ण व्यवस्था पर निबंध (Meaning of Varna System):

प्राचीन हिन्दू शास्त्रकारों ने वर्ण व्यवस्था का विधान समाज की विभिन्न श्रेणियों के लोगों में कार्यों का उचित बँटवारा करके सामाजिक संगठन बनाये रखने के लिये किया ताकि प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने निर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन करते हुए आपसी मतभेदों एवं वैमनस्य से मुक्त होकर अपना तथा समाज का पूर्ण विकास कर सके ।

यह सामूहिक पद्धति से व्यक्ति के उन्नति की योजना है जो भारतीय समाज की अपनी व्यवस्था है । इसके द्वारा व्यक्ति परिवार, समुदाय, समाज तथा देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करता था। इसके द्वारा समाज में एक स्वस्थ वातावरण उत्पन्न होता था तथा वर्ग-संघर्ष एवं उच्छूङ्खल प्रतिस्पर्धा की संभावना समाप्त हो जाती थी।

Essay # 2. वर्ण व्यवस्था पर निबंध (Origin of Varna System):

‘वर्ण’ शब्द संस्कृत की ‘वृ’ धातु से निकला है जिसका शाब्दिक अर्थ वरण करना या चुनना है। इस प्रकार इससे तात्पर्य वृत्ति अथवा व्यवसाय-चयन से है । वर्ण का एक अर्थ रंग भी है तथा इस अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं मिलता है।

ऋग्वेद में इसका प्रथम प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है जहाँ आर्यों ने अपने को श्वेत वर्ण तथा दास-दस्युओं को कृष्णवर्ण का बताया है । कालान्तर में यह शब्द वृत्ति का सूचक वन गया तथा व्यवसाय के आधार पर समाज में वर्णों का विभाजन किया गया । तत्पश्चात् उनमें कठोरता आई तथा व्यवसाय के स्थान पर जन्म को आधार मान लिया गया जिसके फलस्वरूप वर्ण जाति में परिणत हो गये ।

प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति सम्बन्धी विविध उल्लेख प्राप्त होते हैं । इनमें सर्वप्रथम इसे दैवी व्यवस्था मानने का सिद्धान्त है जिसका प्रतिपादन ऋग्वेद, महाभारत, गीता आदि में मिलता है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में चारों वर्षों को विराट पुरुष के चारों अंगों से उत्पन्न कहा गया है।

तदनुसार उसके ‘मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघे से वैश्य तथा पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई।’ चातुर्वर्ण व्यवस्था का यह प्राचीनतम उल्लेख है। यहाँ सम्पूर्ण सामाजिक संगठन एक शरीर के रूप में कल्पित किया गया है जिसके विभिन्न अंग समाज के विविध वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मुख वाणी का स्थान है, अत: ब्राह्मणों की उत्पत्ति मानव जाति के शिक्षक के रूप में हुई । भुजायें शौर्य एवं शक्ति का प्रतीक है, अत: क्षत्रिय का कार्य हथियार ग्रहण करके मानव जाति की रक्षा करना है । जंघा शरीर के निचले भाग का प्रतिनिधि है।

समस्त शरीर को धारण करने का भार जंघों पर ही टिकता है । इससे तात्पर्य संभवतः उस भाग से हो सकता है जो शरीर का पोषण करता है, अत: वैश्य की उत्पत्ति मानव जाति को अन्न प्रदान करने अथवा पोषण करने के लिये है।

यह बात इससे भी स्पष्ट है कि प्राचीन शास्त्रों के अनुसार कृषिकर्म का अधिकार वैश्यों को ही था। वे आर्थिक सम्पत्ति के स्वामी थे । पैर शरीर के भारवाहक हैं, अत: शूद्र की उत्पत्ति समाज का भारवहन करने अर्थात् अन्य वर्णों की सेवा करने के निमित्त हुई है।

ऋग्वेद की वर्णविषयक अवधारणा श्रम-विभाजन के सिद्धान्त पर आधारित है जिसमें प्रत्येक वर्ण के कार्य का महत्व है । इसे दैवी आधार प्रदान करने के पीछे यह मान्यता रही कि ईश्वर की शक्ति से डरकर सभी इसके अनुसार आचरण करेंगे तथा कोई भी इसके उल्लंघन करने का साहस नहीं करेगा।

ऋग्वेद के उपर्युक्त सिद्धान्त का समर्थन महाभारत, गीता, पुराण आदि ग्रन्थों में प्राप्त होता है । महाभारत में विराट पुरुष के स्थान पर ब्रह्मा की कल्पना की गयी है तथा उसके विविध अंगों से चारों वर्षों की उत्पत्ति बताई गयी है।

शान्तिपर्व के अन्तर्गत यह उल्लेख प्राप्त होता है जहाँ बताया गया है कि- ‘ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघे से वैश्य तथा तीनों वर्षों की सेवा के लिये पैर से शूद्र की रचना हुर्ड़ ।’ गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं को चारों वर्णों का कर्ता तथा विनाशक बताया है । मनुस्मृति तथा पुराण भी वर्ण व्यवस्था की दैवी उत्पत्ति के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं । मनु के अनुसार- ‘ब्रह्मा ने लोकवृद्धि के लिये मुख, बाहु, ऊरु तथा पैर से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की सृष्टि की ।’

पुराण ब्रह्मा के स्थान पर विष्णु को इस व्यवस्था का जनक मानते हैं । विष्णु पुराण में भी वर्ण व्यवस्था की दैवी उत्पत्ति को स्वीकार करते हुए बताया गया है कि भगवान विष्णु के मुख, बाहु, जंघे तथा पैर से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई । मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड आदि कुछ अन्य पुराणों में भी इसी प्रकार का विवरण प्राप्त होता है।

वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का दैवी सिद्धान्त आधुनिक परिप्रेक्ष्य में तर्कसंगत नहीं लगता । प्राचीन साहित्य के अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्ण का सम्बन्ध देवता की अपेक्षा गुण तथा कर्म से अधिक था। वस्तुतः कर्म ही इस व्यवस्था की उत्पत्ति में प्रधान तत्व प्रतीत होता है।

गीता में कृष्ण ने बताया है कि ‘चारों वर्णों की उत्पत्ति गुण तथा कर्म के आधार पर की गयी है ।’ गुण तीन कहे गये हैं- सतोगुण (सत्य), रजोगुण (रज) तथा तमोगुण (तम) । सतोगुण ज्ञान, रजोगुण राग (आसक्ति) तथा तमोगुण अज्ञान अथवा अंधकार का सूचक बताया गया है।

प्रत्येक प्राणी में प्रकृति के अनुसार कोई न कोई गुण अवश्य विद्यमान रहता है (गुणा: प्रकृति संभवा:) । अत: जिसमें सत्व की प्रधानता है वह ब्राह्मण, रज की प्रधानता है क्षत्रिय रज तथा तम की प्रधानता है वह वैश्य तथा जिसमें केवल तम की प्रधानता है वह शूद्र होता है ।

चातुर्वर्ण की उत्पत्ति विषयक कर्म का सिद्धान्त सबसे महत्वपूर्ण है । ऋग्वेद से पता चलता है कि समाज में केवल दो वर्ण थे- आर्य वर्ण तथा दास वर्ण । कालान्तर में कर्मों के आधार पर इनके विभेद हुए । जब आर्य भारत में बस गये तो उन्होंने भिन्न-भिन्न कर्मों के आधार पर विभिन्न वर्गों का विभाजन किया ।

जो व्यक्ति यज्ञादि कर्म कराते थे उन्हें ‘ब्रह्म’, जो युद्ध में निपुण थे तथा लोगों को सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ थे उन्हें ‘क्षत्र’ (क्षत्रिय) नाम दिया गया। शेष जनता को ‘विश्’ कहा गया । वर्ण व्यवस्था का यह प्रारम्भिक स्वरूप था। कालान्तर में ‘शूद्र’ नामक चौथा वर्ण इसमें जोड़ दिया गया ।

ऋग्वेद के दशवें मण्डल के पुरुषसूक्त में सर्वप्रथम इस वर्ण का उल्लेख मिलता है । प्रारम्भ में विद्वानों का विचार था कि आर्यों ने यहाँ के निवासियों को पराजित कर दास बना लिया तथा उन्हीं को अपनी सामाजिक व्यवस्था में निम्नतम स्थान देते हुए ‘शूद्र’ की संज्ञा प्रदान की।

किन्तु इस प्रकार का विचार तर्कसंगत नहीं लगता । रामशरण शर्मा ने शूद्रों की उत्पत्ति के ऊपर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालते हुए मत व्यक्त किया है कि वस्तुतः इस वर्ग में आर्य तथा अनार्य दोनों ही वर्गों के व्यक्ति सम्मिलित थे । आर्थिक तथा सामाजिक विषमताओं ने दोनों ही वर्गों में श्रमिक वर्ग को जन्म दिया ।

बाद में सभी श्रमिकों को ‘शूद्र’ कहा जाने लगा । आर्य शिल्पियों के अनेक वंशज, जो अपने प्राचीन व्यवसाय में ही लगे रहे, भी शूद्र समझे जाने लगे। अथर्ववेदिक काल के अन्त में शूद्रों को समाज के एक वर्ग के रूप में मान्यता मिल गयी ।

महाभारत के शान्तिपर्व तथा कुछ पुराणों में भी वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति में कर्म की महत्ता स्वीकार की गयी है । महाभारत के अनुसार पहले समाज में केवल ब्रह्म अर्थात् ब्राह्मण वर्ण का ही अस्तित्व था, बाद में कर्मों की विभिन्नता के कारण अन्य वर्ण उत्पन्न हो गये ।

वायु पुराण का कथन है कि समाज के विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर हुई । इस प्रकार हम देखते कि वर्ण व्यवस्था के प्रारम्भिक स्वरूप के निर्माण में कर्म अथवा कर्तव्य ही मुख्य तत्व था । महाकाव्यों के समय (ईसा पूर्व पाँचवीं शती के लगभग) तक आते-आते इसका आधार जन्म मान लिया गया तथा वर्णों के स्थान पर विभिन्न जातियों की उत्पत्ति हो गयी ।

Essay # 3. वर्ण व्यवस्था पर निबंध (Development of Varna System):

ऋग्वैदिक समाज में प्रारम्भ में केवल तीन वर्ण थे- ब्रह्म, क्षत्र तथा विश । इस काल के अन्त में हम शूद्र वर्ण का उल्लेख पाते हैं । इस समय विभिन्न वर्णों के व्यवसाय खान-पान, विवाह आदि के ऊपर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था और एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण की वृत्ति अपना सकता था ।

इस समय तक वर्णों में कठोरता नहीं आने पाई थी । ऋग्वेद में एक स्थान पर एक ऋषि कहता है- ‘मैं कवि हूँ । मेरा पिता वैद्य है तथा मेरी माता अन्न पीसने का कार्य करती है । साधन भिन्न है किन्तु सभी धन की कामना करते हैं ।’

इससे स्पष्ट है कि एक ही परिवार के व्यक्ति भिन्न-भिन्न व्यवसाय ग्रहण कर सकते थे । इसी प्रकार विभिन्न वर्णों के बीच खान-पान एवं अन्तर्विवाह के ऊपर भी किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं था । वस्तुतः ऋग्वैदिक समाज की वर्ण व्यवस्था उन्मुक्त थी । यह जन्म अथवा वंश पर आधारित न होकर व्यक्ति के गुण और कर्म पर ही आधारित थी ।

उत्तर वैदिक काल तक आते-आते समाज में चारों वर्णों की स्पष्टतः प्रतिष्ठा हुई । इस समय ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद आदि ग्रन्थ लिखे गये । इस काल के समाज में हम प्रथम बार विभिन्न वर्णों के बीच भेदभाव पाते हैं । ब्राह्मण क्षत्रिय तथा वैश्य की पहचान के लिये अलग-अलग प्रकार के यज्ञोपवीत (जनेऊ) का विधान किया गया ।

ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च मानते हुए उसे देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया । वह समस्त धार्मिक क्रियाओं का नियंता था । उसके बिना कोई भी धार्मिक कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता था । वही राजा का पुरोहित होता था । समाज में दूसरा स्थान क्षत्रियों का था जो युद्ध, रक्षा, शासन आदि करते थे ।

कुछ क्षत्रिय शासक, जैसे- जनकादि, अपने दार्शनिक ज्ञान के लिये भी प्रसिद्ध थे । तीसरा स्थान वैश्यवर्ण का था । तैत्तिरीय संहिता में उसका मुख्य उद्यम कृषि तथा पशुपालन बताया गया है । वह याज्ञिक क्रियाओं में भी सहयोग प्रदान करता था ।

समाज के उपर्युक्त तीन वर्णों में हम पारस्परिक सहयोग एवं घनिष्ठता पाते हैं । छान्दोग्य उपनिषद् तथा शतपथ ब्राह्मण में तीनों वर्णों के बीच सहयोग की कामना व्यक्त की गयी है । ‘शूद्र’ वर्ण को इस समय एक पृथक् वर्ग के रूप में मान्यता मिली ।

उसे तीनों वर्णों का सेवक बताया गया तथा धार्मिक क्रियाओं के अयोग्य घोषित किया गया । किन्तु शूद्रों की स्थिति उतनी निम्न नहीं थी जितनी कि सूत्रों एवं स्मृतियों के काल में हो गयी । उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था । इस काल के कुछ ग्रन्थों में आर्य पुरुष तथा शूद्र कन्या के बीच विवाह का भी उल्लेख प्राप्त होता है ।

उत्तरवैदिक काल के कुछ ऋषि शूद्र कन्याओं से ही उत्पन्न हुए थे । इन उल्लेखों से इस वात की सूचना मिलती है कि यद्यपि वर्णों के बीच भेदभाव की भावना का उदय हो गया था तथापि वर्ण व्यवस्था में अभी उतनी जटिलता नहीं आने पाई थी ।

सूत्रों के काल (ई. पू. 600-300) में वर्ण व्यवस्था को सुनिश्चित आधार प्रदान किया गया और प्रत्येक वर्ण के कर्तव्यों का निर्धारण हुआ । राजा को सलाह दी गयी कि वह वर्णधर्म की रक्षा करें । वर्ण का आधार कर्म न मानकर जन्म माना गया तथा ऊँच-नीच की भावना का विकास हुआ ।

विभिन्न वर्णों के लिये दण्डों की अलग-अलग व्यवस्था की गयी । एक ही अपराध में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को अलग-अलग दण्ड मिलता था । ब्राह्मण के अधिकार तथा उसकी सुविधायें बढ़ा दी गयी एवं शूद्रों को अत्यन्त हीन स्थिति में ला दिया गया ।

उसे प्रथम तीन वर्णों की दया पर छोड़ दिया गया तथा उसके समस्त अधिकार एवं सुविधायें जाती रहीं । वशिष्ठ धर्मसूत्र में शूद्र को ‘श्मशान के समान अपवित्र’ कहा गया है । वह विद्याध्ययन तथा संस्कारों से वंचित हो गया । किन्तु गौतम धर्मसूत्र में ‘वार्ता’ को शूद्र का वर्णधर्म बताया गया है ।

इससे सूचित होता है कि वे कुछ सीमा तक कृषि भी करने लगे थे । इसी काल में जैन-बौद्ध आदि निवृत्तिपरक सम्प्रदायों का उदय हुआ । इन्होंने जन्मना वर्ण व्यवस्था का विरोध किया तथा उसका आधार कर्म बताया । क्षत्रियों तथा वैश्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी और अब वे श्रेष्ठता में ब्राह्मणों की बराबरी करने लगे ।

बौद्ध साहित्य क्षत्रिय को ब्राह्मण की अपेक्षा श्रेष्ठतर बताता है । वैश्यों के पास अतुल सम्पत्ति संचित हो गयी । किन्तु शूद्रों की स्थिति यथावत् रही । वे सभी अधिकारों एवं संस्कारों से रहित थे । बौद्ध धर्म ने यद्यपि जाति प्रथा का विरोध किया तथापि उसे विशेष सफलता नहीं मिली ।

महाकाव्यों में वर्ण व्यवस्था का जो स्वरूप मिलता है वह उत्तर वैदिक काल जैसा ही है । महाभारत के एक-दो उल्लेखों से प्रकट होता है कि शूद्रों के प्रति कुछ उदार दृष्टिकोण अपनाया जाने लगा था । विदुर, मातंग आदि कुछ शूद्रों ने इस समय अपने सत्कर्मों से समाज में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त कर लिया था ।

शूद्र के लिये सीमित पैमाने पर कृषि एवं व्यापार की भी अनुमति दे दी गयी । युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ के अवसर पर कुछ शूद्र प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया था । यह सब इस वात का सूचक है कि शूद्रों के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदल रहा था ।

अर्थशास्त्र में चारों वर्णों तथा उनके कर्तव्यों का निरूपण मिलता है । इससे सूचित होता है कि समाज में वर्णाश्रम धर्म को स्थापित करना राजा का परम कर्त्तव्य था । कौटिल्य ने एक स्थान पर लिखा है ‘स्वधर्म का पालन करने से स्वर्ग तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है’ ।

इसके विपरीत होने पर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है जिससे संसार का विनाश हो जाता है (स्वधर्म स्वर्गायानन्त्याय च तस्यातिक्रमे लोक: संकरादुच्छिद्येत) । अत: वह शासक को स्पष्ट आदेश देता है कि वह सभी वर्णों को अपने-अपने धर्म में प्रवृत्त करें ।

धर्मशास्त्रों के समय में वर्ण व्यवस्था का जो स्वरूप निर्धारित हुआ वह वाद के समाजों के लिये आदर्श बनी रही । वर्ण को पूर्णतया जन्मना माना गया । स्मृति ग्रन्थों में विभिन्न वर्णों के व्यवसायों एवं कर्तव्यों की व्याख्या मिलती है । परम्परागत चार वर्णों के अतिरिक्त समाज में बहुसंख्यक वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न हो गयीं ।

मनु ने शकों को व्रात्य क्षत्रिय माना है जो धर्मच्युत थे । मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था के सिद्धान्तों का स्पष्टतः निर्धारण मिलता है । शुंगो के समय में तदनुसार समाज को व्यवस्थित किया गया । किन्तु गुप्त काल तक वर्ण व्यवस्था में नमनीयता बनी रही ।

स्मृतियों में अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाहों का विधान है तथा प्रथम को मान्यता प्रदान की गयी है । इसमें उच्च वर्ण का व्यक्ति अपने ठीक नीचे के वर्ण की कन्या से विवाह करता था और यह सम्बन्ध शास्त्रसंगत था । द्वितीय इससे उल्टा था जो निन्दनीय कहा गया है ।

अभिलेखों में भी अन्तर्जातीय विवाहों के उदाहरण मिलते हैं । गुप्तकाल के वाद बाह्य आक्रमणों के कारण समाज में अव्यवस्था फैली जिससे वर्ण व्यवस्था को ठोस आधार पर प्रतिष्ठित करने के प्रयास हुए। खान-पान एवं विवाह में कट्टरता आई ।

हर्षकालीन लेखों-मधुबन तथा बंसखेड़ा-से पता चलता है कि प्रभाकर वर्धन ने समाज में वर्णाश्रम धर्म को प्रतिष्ठित किया था । हर्षचरित से पता चलता है कि हर्ष वर्णाश्रम धर्म का पोषक था । राजपूत युग तक आते-आते परम्परागत वर्ण विभिन्न उपजातियों में विभक्त हो गये । अस्पृश्यता की भावना का पूर्ण विकास हुआ जिससे छुटकारा पाने के लिये हिन्दू समाज आज तक छटपटा रहा है ।

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