हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास : हिंदी नाट्य साहित्य का आरंभ आधुनिक काल से होता है । हिंदी से पहले संस्कृत और प्राकृत में समृद्धि नाट्य- परंपरा थी लेकिन हिंदी नाटकों का विकास आधुनिक युग से ही संभव हो सका । मध्यकाल में रासलीला, रामलीला, नौटंकी ,आदि का उदय होने से जन नाटकों का प्रचलन बढ़ा यह नाटक मनोरंजन के प्रमुख स्त्रोत थे।

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

17वीं 18 वीं शताब्दी के लगभग कुछ ऐसे नाटक भी लिखे गए जो ब्रजभाषा में थे जैसे प्राणचंद चौहान का ‘ रामायण महानाटक ‘ व विश्वनाथ सिंह का ‘ आनंद रघुनंदन ‘ इसमें ‘ आनंद रघुनंदन ‘ को हिंदी साहित्य का प्रथम मौलिक नाटक माना जाता है । कथोपकथन ,अंक विभाजन , रंग संकेत आदि के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे हिंदी का प्रथम मौलिक नाटक माना है।

इस दौर के सभी नाटक पर संस्कृत नाट्य साहित्य की छाप नजर आती है ।इसकी विषय वस्तु धार्मिक व पौराणिक है ।इसके संवाद पद्यात्मक है ।श्रृंगार इसकी मूल प्रवृत्ति है।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पारसी थिएटर कंपनियां अस्तित्व में आ चुकी थी । इनका प्रमुख उद्देश्य विभिन्न नाटकों द्वारा जनता का मनोरंजन करना था । इनके नाटकों के कथानक कभी रामायण – महाभारत से कभी पारसी प्रेम कथाओं से , और कभी अंग्रेजी नाटक ‘ हैमलेट ‘ ,’ रोमियो जूलियट ‘ आदि से लिए जाते थे। इसमें बचकाने नृत्य, स्थान – स्थान पर गीत , शेरो- शायरी , ग़ज़ल आदि का समावेश रहता था । ऐसा ही नाटक अमानत द्वारा लिखी ‘ इंद्रसभा ‘ है। ‘ ओपेरा ‘ के समान इस नाटक का अधिकांश भाग गीतों से भरा है । बीच – बीच में संवाद है । ऐसे नाटकों द्वारा उत्पन्न कलाहीन , और असंस्कृति वातावरण से क्षुब्ध होकर भारतेंदु ने हिंदी नाटक को साहित्य कलात्मक रूप देने का प्रयास किया । उनके द्वारा स्थापित इस परंपरा को जयशंकर प्रसाद ने नया स्वरूप व नई दिशा प्रदान की। आगे चलकर मोहन राकेश जैसे नाटककारों ने इस परंपरा को आधुनिक यथार्थ से गहराई से जोडा।

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

जिस तरह हिंदी कहानी व उपन्यास में प्रेमचंद का स्थान केंद्रीय महत्व का है । उसी तरह हिंदी नाटकों में जयशंकर का है । उन्हें केंद्र में रखकर हिंदी नाट्य साहित्य को हम विभिन्न युगों में बांट सकते हैं।

1 प्रसाद पूर्व हिंदी नाटक
2 प्रसाद युगीन हिंदी नाटक
3 प्रसादोत्तर स्वतंत्रता पूर्व हिंदी नाटक
4 स्वतंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक

( 1 ) प्रसाद पूर्व हिंदी नाटक

इस काल के साहित्य को दो उप- खंडों में विभाजित किया जा सकता है । (क) भारतेंदु युगीन नाटक (ख) द्विवेदी युगीन नाटक।

(क) भारतेंदु युगीन नाटक (1850 – 1900ई.):

खड़ी बोली में प्रथम आधुनिक नाटक लिखने का श्रेय भारतेंदु को है । भारतेंदु का युग नाट्य साहित्य का प्रथम चरण है । यह दौर सामाजिक , सांस्कृतिक , राजनीतिक , परिवर्तनों का दौर था । एक वर्ग पाश्चात्य संस्कृति का समर्थन कर रहा था , तो दूसरा विरोध। अंग्रेजी साहित्य का प्रभाव पड़ रहा था । ऐसे में नई मान्यताएं , दृष्टिकोण और सृजनात्मक दिशा देने की आवश्यकता थी । भारतेंदु ने यही किया है । भारतेंदु के नाटकों का मूल उद्देश्य मनोरंजन के साथ जनसामान्य को जागृत करना तथा उसमें आत्मविश्वास जगाना था ।

प्राचीन संस्कृति के प्रति प्रेम जगाने , मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था बनाए रखने , तथा पश्चिम के गलत प्रभाव से समाज को बचाए रखने , का प्रयास इन नाटकों में हुआ है इस दौर के प्रसिद्ध नाटक हैं- देवकीनंदन खत्री का ‘ सीताहरण ‘ भारतेंदु का ‘ भारत दुर्दशा ‘ व ‘ अंधेर नगरी ‘ तथा प्रताप नारायण मिश्र का ‘ शिक्षादान ‘ आदि इस युग में प्रहसन अधिक लिखे गए । इन प्रहसनों में हास्य – व्यंग्य शैली में तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक कुरीतियों , कुप्रथाओं , एवं अंधविश्वासों का मजाक उड़ाया गया है । भारतेंदु का ‘ वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ‘ तथा राधाचरण गोस्वामी का ‘ बूढ़े मुंह मुहासे ‘ इसी शैली के नाटक है।

भारतेंदु युगीन नाटकों में प्राचीन – नवीन शैलियों का सामंजस्य दिखाई देता है । जो नाटक संस्कृत शैली में लिखे गए , उनके पात्र आदर्श आधारित हैं । जबकि नवीन शैली में नाटकों के पात्र सच्चे जीवन के प्रतिनिधि नजर आते हैं । शिल्प की दृष्टि से यह नाटक ना तो पूर्णता प्राचीन – नाट्य शास्त्र से जुड़े हैं और ना ही इनमें अंग्रेजी परंपरा की नकल उतारी गई है । भारतेंदु ने ही पाश्चात्य ट्रेजडी पद्धति पर दुखांत नाटक लिखे हैं । उनका ‘ नीलदेवी ‘ नाटक दुखांत के नजदीक है ।
इस काल में अनूदित नाटक भी लिखे गए । भवभूति व कालिदास के संस्कृत नाटकों के हिंदी अनुवाद अधिक हुए । राजा लक्ष्मण सिंह ने ‘ अभिज्ञान शाकुंतलम् ‘ का अनुवाद किया बंगला से माइकेल मधुसूदन दत्त के नाटकों के अनुवाद हुए । अंग्रेजी से शेक्सपियर के ‘ मर्चेंट ऑफ वेनिस ‘, ‘ मैकबेथ ‘ का अनुवाद हुआ।
भारतेंदु युग के सर्वश्रेष्ठ नाटककार भारतेंदु हरिश्चंद्र थे । अन्य नाटककार है श्रीनिवास दास , बालकृष्ण भट्ट , प्रताप नारायण मिश्र , राधाचरण गोस्वामी , व राधाकृष्णदास , इन में सभी ने भारतेंदु का ही अनुसरण किया है ।

(ख) द्विवेदी युगीन नाटक (1900 -1918 ई.)

द्विवेदी युग में भारतेंदु जैसी कोई प्रतिभा नहीं थी । भारतेंदु द्वारा स्थापित रंगमंच आगे न बन सका । परिणामस्वरुप जनता व्यवसायिक रंगमंचीय नाटकों में अधिक रुचि लेने लगी । द्विवेदी युग में पौराणिक, ऐतिहासिक , सामाजिक , एवम रोमांचकारी नाटक लिखे गए कुछ प्रहसन भी लिखे गए । इन नाटकों में नाट्य कला का विकास नहीं मिलता और अभिनय तत्व भी नहीं के बराबर है। इस युग के नाटक हैं –

जयशंकर प्रसाद – करुणालय
प्रताप नारायण मिश्र – भारत दुर्दशा

द्विवेदी युग के नाटकों पर पारसी रंगमंच का प्रभाव रहा । इन नाटकों का महत्व न तो शिल्प की दृष्टि से ही और ना ही सुरुचि संस्कार की दृष्टि से । फिर भी कुछ नाटकों में तत्कालीन समाज की विकृतियां उभरकर आई है जिस का ऐतिहासिक महत्व है।

(2) प्रसाद युगीन नाटक

जयशंकर प्रसाद के आगमन से नाटक के विकास को नई दिशा मिली । इस समय देश में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन विकसित हो रहा था । व्यापक सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतना की लहर ने इस समय साहित्य को प्रभावित किया इसलिए भारत के अतीत की खोज एवं वर्तमान समस्याओं व दुर्बलताओं से लड़ने का साहस प्रसाद के नाटकों की प्रेरणा बने। ध्यातव्य है कि इसी काल में पारसी थियेटर अपने चरम विकास पर था तथा अत्यंत लोक प्रचलित भी था । इसलिए इस काल की नाट्य प्रवृतियों पर इसका प्रभाव भी अत्यंत व्यापक रूप में नजर आता है ।
इस युग के प्रमुख रचना रचनाकार है – जयशंकर प्रसाद, आगा हश्र ‘ कश्मीरी ‘ , नारायण प्रसाद ‘ बेताब ‘ सुदर्शन और जी पी श्रीवास्तव । इस युग के प्रमुख नाटक है :-

जयशंकर प्रसाद – ‘ कल्याणी ‘, ‘ करुणालय ‘, ‘ राजश्री’, ‘ स्कंदगुप्त ‘, ‘ चंद्रगुप्त ‘, ‘ अजातशत्रु ‘, ‘ध्रुवस्वामिनी ‘, ‘विशाख’,।
आगा हश्र – ‘ सूरदास ‘, ‘ श्रवणकुमार ‘ ,’ सीता ‘, ‘ वनवास ‘,।
नारायण प्रसाद ‘ बेताब ‘ – ‘ महाभारत ‘, ‘ रामायण ‘ , ‘ कृष्ण सुदामा ‘,।
सुदर्शन – ‘ सिकंदर ‘, ‘ धूपछांह ‘ ।
इस काल के नाटक साहित्य में मुख्यतः पांच प्रकार के नाटक दिखाई पड़ते हैं ।

(1) ऐतिहासिक नाटक

यह इस युग की सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है । प्रसाद ने ‘ राज्यश्री ‘ , ‘ विशाख ‘, ‘ अजातशत्रु ‘ , ‘ स्कंदगुप्त ‘ , ‘ चंद्रगुप्त ‘ आदि ऐतिहासिक नाटक लिखे । बद्रीनाथ भट्ट ने ‘ दुर्गावती ‘ नाटक लिखा । इस युग के नाटककारों ने इतिहास संबंधी तथ्यों को कल्पना के मिश्रण से आकर्षित और प्रभावशाली बनाकर नाटकों में प्रस्तुत किया । इतिहास के बीच ही उन्होंने नाटकों में प्रेम और सौंदर्य के मधुर चित्र खींचे इस क्षेत्र में उनकी दृष्टि रोमांटिक होते हुए भी संयमित रही। इस तरह के नाटकों में ‘ स्कंदगुप्त ‘, ‘ चंद्रगुप्त ‘ , ‘ ध्रुवस्वामिनी ‘ प्रमुख थे । इन में राष्ट्रीय चेतना व सांस्कृतिक वातावरण की उपस्थिति सर्वत्र देखी जा सकती है । इनके नाटकों में काव्य तत्व की प्रकृति ज्यादा है ।

(2) रोमांचकारी नाटक

रौनक बनारसी का ‘ इंसाफे महमूद ‘ हुसैन मियां जरीफ का ‘ लैला मजनू ‘ ,’ अलीबाबा ‘ आदिकाल के प्रमुख रोमांचकारी नाटक है इनके नाटकों में श्रृंगार पूर्ण वातावरण उत्तेजक घटना विधान, वेश विन्यास की तड़क-भड़क व छिछले किस्म के संवाद से जनता का मनोरंजन करना प्रमुख उद्देश्य था । नाटक कला की दृष्टि से इन्हें साहित्य नाटक नहीं माना जा सकता ।

(3) पौराणिक नाटक

पौराणिक नाटक एक और तो नैतिक उपदेशों से भरे होते थे किंतु दूसरी ओर उनमें रोमांचकारी प्रभाव उत्पन्न करने का भी प्रयास रहता था । पौराणिक नाटकों में कुछ नाटक , सुदर्शन आदि ने लिखे।

(4) समसामयिक नाटक

इन नाटकों में समसामयिक समस्याओं को उठाया गया है परंतु उनमें गंभीर विश्लेषण का अभाव है । इनमें हास्य का प्रयोग किया गया है परंतु अति नाटकीयता वह सस्ते किस्म के हास्य ने नाटकों के उद्देश्य को क्षति पहुंचाई है। प्रमुख उदाहरण इस प्रकार है –
बेचैन शर्मा उग्र – ‘ चार बेचारे ‘, ‘ उजबक ‘ ।
जी . पी .श्रीवास्तव – ‘ उलटफेर ‘ ,’ विवाह ‘, ‘ विज्ञापन ‘ ।
राधेश्याम कथावाचक – ‘ काउंसिल की मेम्बरी ‘ ।

(5) यथार्थवादी नाटक

इस युग में यथार्थवादी नाटकों की भी नींव पड़ी जिसमें मानव जीवन की विविध समस्याओं का यथार्थ चित्रण गंभीरता पूर्वक किया गया। इनमें प्रेमचंद का ‘ संग्राम ‘ नाटक उल्लेखनीय है।

प्रसाद युग के नाटकों के संवाद पात्रों के चरित्र के उद्घाटन और कथानक को गतिशील बनाने में सहायक हैं । लेकिन संवाद योजना में अनेक स्थलों पर लंबे – लंबे कथोपकथन आए हैं जिन्होंने प्रवाह को बाधित किया है । प्रसाद युगीन नाटकों की भाषा सशक्त है किंतु कहीं-कहीं नाटकीय तनाव धारण नहीं कर पाती है ।
विशेषकर प्रसाद ने भाषा का प्रयोग भाव के अनुसार किया, पात्रों के अनुसार नहीं । उनके यहां कलात्मकता , अलंकारीकता , लाक्षणिकता के दर्शन होते हैं । यद्यपि कहीं-कहीं उनकी भाषा बोझिल हो गई है प्रसाद युग के नाट्य शैली ना तो दुखान्त थे ना ही सुखान्त , उसमें दोनों शैलियों का सुंदर समन्वय किया गया है।
इस युग में नाटकों के अनुवाद भी हुए मैथिलीशरण गुप्त ने भास के ‘ स्वप्नवासवदत्ता ‘ का अनुवाद किया रविंद्रनाथ ठाकुर और गिरीश घोष के नाटकों के अनुवाद भी हुए।

(3) प्रसादोत्तर स्वतंत्रता पूर्व हिंदी नाटक

इस युग तक आते-आते भारत के सामाजिक – राजनीतिक जीवन में कोई परिवर्तन आए। अब जीवन में भावना तथा आदर्श का स्थान यथार्थ ने ले लिया राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में मजदूर – किसान भी शामिल हो गए। पारसी रंगमंच की लोकप्रियता कम हुई क्योंकि सिनेमा का प्रभाव अधिक पढ़ रहा था । इस काल में प्रमुखतः दो प्रकार के नाटक लिखे गए –

(1) राष्ट्रीय चेतना पर आधारित नाटक

राष्ट्रीय चेतना पर नाटक लिखने वालों में थे ‘ हरिकृष्ण प्रेमी ‘ , ‘ सेठ गोविंद दास ‘ तथा ‘ उदयशंकर भट्ट ‘ । इन्होंने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की चेतना से युक्त अपने नाटकों में समन्वयवादी दृष्टि वह नैतिक मूल्यों पर बल दिया इस कोटि के उल्लेखनीय नाटक हैं –
हरिकृष्ण प्रेमी – ‘ रक्षाबंधन ‘ ,’ आहुति ‘।
गोविंद बल्लभ पंत -‘ राजमुकुट ‘ ।
सेठ गोविंददास – ‘ कर्तव्य ‘ ।

(2) यथार्थपरक समस्या प्रधान नाटक

समस्या प्रधान नाटकों में व्यक्ति मन के द्वंद्व , स्वच्छंद प्रेम , विवाह समस्या , मूल्यों के विघटन , आदि विषय प्रमुख रहे । यह पहली बार हुआ कि व्यक्ति पर नाटक लिखे गए इस कोटि के नाटक हैं –
उपेंद्रनाथ अश्क – ‘ अंजोदीदी ‘
बेचन शर्मा उग्र – ‘ आवारा ‘ , ‘ डिटेक्टर ‘
हरि कृष्ण प्रेमी – ‘ छाया ‘
लक्ष्मीनारायण मिश्र – ‘ सन्यासी ‘ , ‘ मुक्ति का रहस्य ‘
समस्या प्रधान नाटकों में पात्र कम होते हैं एवं इनका कार्य व्यापार सीमित होता है । इसलिए इनमे जीवन के विभिन्न विषयों की प्रस्तुति नहीं हो सकती है लक्ष्मी नारायण मिश्र समस्या नाटकों के प्रतिनिधि नाटककार हैं ।

(4) स्वातंत्र्योत्तर नाटक ( 1947 से आज तक )

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत हिंदी नाटक साहित्य में कई नई प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती है जो इस प्रकार है –

(1) आधुनिकता बोध एवं विसंगति बोध

स्वतंत्रता के बाद नव – निर्माण की आकांक्षा ने लोगों में उत्साह का संचार किया । लेकिन इस दिशा में मिली असफलता से उत्पन्न मोहभंग ने लोगों को निराश एवं कुंठित भी किया । इन परिस्थितियों में मध्यम वर्ग सर्वाधिक प्रभावित हुआ। अतः इस दौर में जो नाटक लिखे गए उनमें मध्यवर्ग की आशाओं , आकांक्षाओं वह विडंबनाओं का चित्रण किया गया । इन नाटककारों ने आधुनिकता बोध के नाटक लिखे इन्हें नवलेखन ‘ नवलेखन ‘ के दौर के नाटक या ‘ नया नाटक ‘ नाम से भी जाना जाता है । जिस प्रकार की प्रवृतियां नई कहानी , नई कविता , में मिलती है वैसी ही नए नाटक में । भुवनेश्वर प्रसाद के ‘ असर ‘ नाटक से आधुनिकता बोध का आरंभ माना गया है । इन्ही के दूसरे नाटक ‘ तांबे के कीड़े ‘ से विसंगति बोध के नाटक की शुरुआत हुई । विसंगति बोध का अर्थ है मानव जीवन का निरूउद्देश्य और अर्थहीन होना। कामू , सैमुअल बेकेट की पाश्चात्य ‘एब्सर्ड परंपरा ‘ से मिलते – जुलते ऐसे नाटक काफी मात्रा में लिखे गए हैं ।

आधुनिकता बोध को स्थापित करने की दृष्टि से धर्मवीर भारती का ‘ अंधा युग ‘ एवं मोहन राकेश के ‘आधे – अधूरे ‘, ‘ आषाढ़ का एक दिन ‘ , व ‘ लहरों के राजहंस ‘ उल्लेखनीय है । धर्मवीर भारती का ‘ अंधा – युग ‘ में महाभारत युद्ध के उपरांत कि जिन परिस्थितियों एवं घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है । वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की घटनाओं का प्रतीकात्मक चित्रण करती है । अपनी प्रतीकात्मकता से यह नाटक सिद्ध करता है कि कोई भी लड़ाई सत्य के लिए नहीं बल्कि सत्य से हटकर होती है दोनों पक्षों असत्य होते हैं कोई कम कोई अधिक।

मोहन राकेश ने मूलतः आधुनिक मानव के द्वंद्व और तनाव को अपने नाटकों का विषय बनाया है । रंगमंच के स्तर पर मोहन राकेश प्रसाद की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं । इनकी भाषा चरम रचनात्मक तथा नाटकीय संभावनाओं से युक्त है । ‘ आषाढ़ का एक दिन ‘ की कथा कालिदास की प्रणय कथा है। यह नाटक सत्ता और सृजनात्मकता के द्वंद्व एवं जटिल संबंधों को व्यक्त करता है । ‘ लहरों के राजहंस ‘ गौतम बुद्ध के भ्राता नंद के द्वन्द्व को रूपायित करता है । इसमें राग-विराग , मोह- त्याग , सांसारिकता , आध्यात्मिकता के द्वंद को सफलतापूर्वक उभारा गया है । ‘ आधे अधूरे ‘ यथार्थ की सीधी अभिव्यक्ति करने वाला एक आडंबर ही नाटक है। जो आधुनिक मध्यम वर्गीय परिवार के टूटने बिखरने की कथा है । कुछ आलोचकों ने तो यहां तक कहा है कि आधे अधूरे आधुनिक भाव बोध तथा आधुनिक रंग चेतना का पहला नाटक है ।

लक्ष्मीनारायण लाल इसी समय के एक अन्य महत्वपूर्ण नाटककार है । जिन्होंने ‘ मादा कैप्टन ‘ नाटक मे कला को प्रण्य के अंतर्विरोध को प्रस्तुत किया है । यह नाटक एक दूसरे स्तर पर पीढ़ियों के मूल्यों के संघर्षों को रूपायित करता है। लक्ष्मीनारायण लाल लघु नाटकों के लिए प्रसिद्ध है जो भले ही पाश्चात्य रंगशिल्प और आधुनिकता के प्रयोग हो पर यथार्थवादी है ।

मोहन राकेश की परंपरा में ही एक अन्य नाम है – ‘ सुरेंद्र वर्मा ‘ इन्होंने खासतौर पर आधुनिक जीवन के तनाव को तल्खी को व्यक्त करने की कोशिश की है। ‘ द्रोपदी ‘, ‘ सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक ‘ ,’ आठवां सर्ग ‘ इनके प्रमुख नाटक है । ‘ द्रोपदी ‘ में आधुनिक मनुष्य के बहु – मुखोटेपन को व्यक्त किया गया है । ‘ सूर्य की अंतिम किरण से पहली किरण तक ‘ में स्त्री के काम – मनोवैज्ञान को बहुत काव्यात्मकता के साथ व्यक्त किया गया है । ‘ आठवां सर्ग ‘ में अश्लीलता और लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न उठाया गया है ।
इस काल में भ्रष्टाचार , पीढ़ियों के संघर्ष , संबंधों की अर्थ हीनता , समसमायिक व्यंग , राजनीतिक संदर्भ, आदि विषयों पर नाटक लिखे गए।

(2) पाश्चात्य शिल्प

इस समय पाश्चात्य रंगशिल्प पर आधारित कई नाटक आए जिसमें सूत्रधार , कथाविहीनता , नायकहीनता , का प्रचलन बढ़ा । हिंदी नाटक को नवीनता की ओर उन्मुख करने में रमेश बख्शी का योगदान महत्वपूर्ण रहा । उन्होंने नाटक में भाषा परिवेश व संदर्भ में बोल्डनेस का मुहावरा चलाया।
70 के दशक तक हिंदी नाटक की रंगमंचीयता काफी खुली और कथा के स्तर पर उसमें विस्तार एवं सूक्ष्मता आ गई । 70 के बाद की नाट्य रचना अपने समय के जटिल यथार्थ से टकराती है एवं रंगचेतना की भी पूरी रक्षा करती है । इन नाटकों की अंतर्वस्तु काफी व्यापक है । प्रमुख नाटककार हैं-

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना – ‘ बकरी ‘
ज्ञानदेव अग्निहोत्री – ‘ शुतुरमुर्ग ‘
भीष्म साहनी – ‘ कबीरा खड़ा बाजार में’ , ‘ मुआवजे ‘
बृजमोहन शाह – ‘ त्रिशंकु ‘

इनमें ज्ञानदेव अग्निहोत्री तथा बृजमोहन शाह नाटक से रंगमंच की ओर नहीं बल्कि रंगमंच की सक्रियता से लेकर नाटक रचना की ओर अग्रसर हुए । ज्ञानदेव के ‘ शुतुरमुर्ग ‘ में प्रतीक और फैंटेसी का प्रयोग विशेष है , और बृजमोहन शाह के ‘ त्रिशंकु ‘ की रंगमंचीयता गतिशीलता महत्वपूर्ण है । इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण निर्देशकों ने भी अपनी कल्पना से नाटकों को समृद्ध किया इनमें प्रमुख है – इब्राहिम अल्काजी, श्यामानंद जालान , ब.व.कांरत , सत्यदेव दुबे , हबीब तनवीर , सत्यव्रत सिन्हा , आदि।

(3) नुक्कड़ नाटक

हिंदी नाट्य परंपरा के विकास में एक धारा नुक्कड़ नाटकों की भी है । नुक्कड़ नाटकों ने जीवन की समस्याओं को रंगमंचीय तामझाम के बिना ही सामने रखने की कोशिश की है । यह कुल मिलाकर जनता एवं रंगकर्मी के बीच संवाद है , और यह आश्वासन देता है कि रंगमंच को शास्त्रीय अड़चनों के बिना भी सामने रखा जा सकता है । हबीब तनवीर नुक्कड़ नाटकों के प्रतिनिधि हैं।

हिंदी नाटक का उद्भव और विकास

समग्रतः हिंदी नाटक के क्षेत्र में स्वातंत्र्योत्तर काल भारतेंदु काल के बाद सर्वाधिक सक्रियता का काल रहा है । इस दौर में कथ्य और शिल्प के स्तर पर तीव्र परिवर्तनों ने हिंदी नाटक को एक नई दिशा दी । इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के दबाव के बावजूद यह परिवर्तन हिंदी नाटक के विकास के प्रति आश्वस्त करते हैं।

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