निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल सूक्ति पर निबंध

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल सूक्ति पर निबंध

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल सूक्ति पर निबंध

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल सूक्ति पर निबंध : संकेत बिंदु– (1) निजभाषा का अर्थ-हिंदी (2) संपूर्ण भारत में हिन्दी का अनिवार्य प्रयोग (3) हिंदी की उन्नति सब उन्नति का मूल (4) भाषा मानव मस्तिष्क की प्रयोगशाला (5) राष्ट्र की वैज्ञानिक और औद्योगिक उन्नति प्रगति के साक्ष्य।

अपने देश की भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से आगे बढ़ने में ही देश की उन्नति और महिमा है। यह एक ध्रुव सत्य है। इसकी अवहेलना से राष्ट्र-विकास का तो प्रश्न ही नहीं उठता, उलटा देश की उन्नति अवरुद्ध हो जाएगी। प्रगति के पग रुक जाएंगे। निज भाषा का अर्थ मातृभाषा नहीं है। कारण, प्रान्तीय भाषाओं की उन्नति से प्रांतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की उन्नति होगी, किन्तु सम्पूर्ण देश की नहीं। भारत के 25 स्वशासित प्रांत तथा केन्द्रशासित प्रांत जब अपनी-अपनी भाषा की उन्नति में सर्व-उन्नति का फल देखना चाहेंगे, तो भारत 32 भागों में विभक्त होगा और प्रत्येक प्रांत स्वतन्त्र राष्ट्र। अतः “निज भाषा” की यह व्याख्या संकीर्णता पूर्ण तथा विघटनकारी होगी।

निजभाषा का अर्थ-हिंदी

निज भाषा का अभिप्राय भारत देश की भाषा से है। भारत देश की भाषा है– हिन्दी। नागरी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ी बोली ही हिन्दी है। खड़ी बोली हिन्दी के विकास से तात्पर्य है कि उसकी इतनी शक्ति बढ़े की वह वात्सल्य, करुणा, ईश्वरानुभूति, अलौकिक अनुभूति, क्रोध, ईर्ष्या, जुगुप्सा आदि भावों तथा देश और प्रकृति के भिन्न-भिन्न विचारों को व्यक्त करने में पूर्णतः समर्थ हो। दूसरी ओर, वैज्ञानिक तकनीकी, प्रौद्योगिक, राजनीतिक, कानूनी, विभिन्न कलाओं तथा प्रशासनिक भावों को अभिव्यक्त करने में सक्षम हो। तीसरी ओर, उसका साहित्य इतना विकसित हो कि न केवल काव्य तथा गद्य-विधाओं (उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबन्ध, संस्मरण, जीवनी) में पुस्तकें छपें, अपितु देश-विकास के प्रत्येक क्षेत्र से वैज्ञानिक, तकनीकी, औद्योगिक, कानूनी, राजनीतिक, कला, प्रशासनिक आदि से सम्बद्ध पुस्तकें उपलब्ध हों।

संपूर्ण भारत में हिन्दी का अनिवार्य प्रयोग

निज भाषा उन्नति से दूसरा अभिप्राय स्व-भाषा के प्रचार-प्रसार से है। खेद का विषय है कि अभी तो सम्पूर्ण भारत में ही हिन्दी का प्रचार-प्रसार नहीं है। इतना ही नहीं, राजनीतिज्ञों की कृपा के कारण भाषा की दृष्टि से भारत दो भागों में बंट गया है– हिन्दी भाषी प्रांत तथा अहिन्दी भाषी प्रांत। देश में हिन्दी का प्रचार-प्रसार बढ़े इसके लिए देश कृत्रिम तथा राजनीतिक विभाजन को समाप्त करना होगा। राष्ट्र-भाषा के रूप में सम्पूर्ण भारत में हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य करना होगा। हिन्दी साहित्य की बहुचर्चित और अमूल्य पुस्तकों के पाठक सम्पूर्ण भारत में तैयार करने होंगे तथा इनका अनुवाद प्रांतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना होगा।

राजकीय कार्यों में अपवाद रूप में जहाँ हिन्दी-शब्दावली सक्षम नहीं है, अंग्रेजी शब्दावली को स्वीकार करते हुए प्रशासन में हिन्दी की अनिवार्यता घोषित करनी होगी। राजकीय पदोन्नतियों में हिन्दी की परीक्षा का उपाधि-पत्र (प्रमाण-पत्र नहीं) भी एक अनिवार्य शर्त हो। साथ ही, ‘पब्लिक स्कूल-परम्परा’ को जड़मूल से समाप्त करना होगा तथा दैनिक जीवन में हिन्दी-व्यवहार को प्राथमिकता देनी होगी।

हिंदी की उन्नति सब उन्नति का मूल

हिन्दी की उन्नति ‘सब उन्नति का मूल’ कैसे है? हिन्दी के विकास तथा प्रचार-प्रसार में देश की प्रगति और महिमा के बीज कैसे छुपे हैं?

महावीरप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं, अपने देश, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।” महात्मा गाँधी कहते हैं, अपनी भाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देशभक्त नहीं बन सकता। समाज का सुधार अपनी भाषा से ही हो सकता है। हमारे व्यवहार में सफलता और उत्कृष्टता भी हमारी अपनी भाषा से ही आएगी।” कविवर बल्लतोल कहते हैं, आपका मस्तक यदि अपनी भाषा के सामने भक्ति से झुक न जाए तो फिर वह कैसे उठ सकता है।” अज्ञेय जी कहते हैं, किसी भी समाज को अनिवार्यतः अपनी भाषा में ही जीना होगा। नहीं तो उसकी अस्मिता कुण्ठित होगी ही होगी और उसमें आत्म-बहिष्कार के विचार प्रकट होंगे।”

किसी राष्ट्र की संस्कृति उस राष्ट्र की आत्मा है। राष्ट्र की जनता उस राष्ट्र का शरीर है। उस जनता की वाणी राष्ट्र की भाषा है। डॉ. जानसन की धारणा है, भाषा विचार की पोशाक है।’ भाषा सभ्यता और संस्कृति की वाहन है और उसका अंग भी। माँ के दूध के साथ जो संस्कार मिलते हैं और जो मीठे शब्द सुनाई देते हैं, उनके और विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के बीच जो मेल होना चाहिए वह अपनी भाषा द्वारा ही सम्भव है। विदेशी भाषा द्वारा संस्कार-रोपण असम्भव है। अत: निज भाषा उन्नति से ही देश की सांस्कृतिक उन्नति सम्भव है। आज के मम्मी, डैड, अंकल, आंटी की संस्कृति बालकों पर विदेशी भाषा का भारतीय-संस्कृति पर आक्रमण ही तो है।

भाषा मानव मस्तिष्क की प्रयोगशाला

कालरिज कहते हैं, भाषा मानव-मस्तिष्क की वह प्रयोगशाला है, जिसमें अतीत ही सफलताओं के जय-स्मारक और भावी सफलताओं के लिए अस्त्र-शस्त्र, एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह साथ रहते हैं।” इसका अर्थ है कि भाषा के द्वारा ही प्राचीन गौरव अक्षुण्ण रहता है और उज्ज्वल भविष्य के बीज उसमें निहित रहते हैं। भारत के प्राचीन गौरव की महिमा को जीवित रखने के लिए विश्व में उसकी विजय-पताका फहराने के लिए हिन्दी की उन्नति अनिवार्य है।

राष्ट्र की वैज्ञानिक और औद्योगिक उन्नति प्रगति के साक्ष्य

राष्ट्र की वैज्ञानिक तथा औद्योगिक उन्नति और प्रगति के साक्ष्य हैं– जापान और अमेरिका। अमेरिका वैज्ञानिक दृष्टि से और जापान औद्योगिक प्रगति से विश्व में सर्वोच्च शिखर पर आसीन हैं। इन दोनों को अपनी-अपनी भाषा पर गर्व है। ये अपनी-अपनी भाषा द्वारा राष्ट्र को यश प्रदान कराने में गौरव अनुभव करते हैं। जीवन के कुछ क्षेत्रों में हिन्दी अभी अक्षम है, पर विश्वास रखिए, जब उसका आम प्रचलन होगा तो हिन्दी भाषा का शरीर दुरुस्त, उसकी सूक्ष्माति-सूक्ष्म नाड़ियाँ तैयार हो जाएँगी एवं नसों में रक्त प्रवाह और हृदय में जीवन स्पन्दन पैदा हो जाएगा, तब भारत में हिन्दी का यौवन वसन्त की नई कल्पनाएँ करता हुआ उन्नति के नए-नए मार्ग खोलेगा।। अत: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यह कथन सत्य है–

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥

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