रजिया सुल्तान – चरित्र उपलब्धिया और पतन

रजिया सुल्तान – चरित्र उपलब्धिया और पतन

रजिया सुल्तान – चरित्र ,उपलब्धिया और पतन : प्रश्न रजिया में एक अच्छे शासक के सभी गुण निहित थेकिन्तु वह असफल रहीक्योंकि इसके लिए उसका स्त्रीत्व उत्तरदायी था। “व्याख्या कीजिए।   अथवा  ”रजिया सुल्ताना के चरित्र एवं उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिए। क्या रजिया का स्त्री होना उसके पतन का कारण माना जा सकता है ? अथवा  ”रजिया के सिंहासनारोहण की परिस्थितियों का वर्णन कीजिए और उसके पतन के कारणों पर प्रकाश डालिए।

रजिया सुल्तान – चरित्र उपलब्धिया और पतन

उत्तर- रजिया सुल्तान अत्यन्त योग्य, प्रतिभाशाली और शासकीय गुणों से सम्पन्न थी। उसने 1236 से 1240 . तक शासन किया। बलबन से पूर्व के इल्तुतमिश के सभी दुर्बल उत्तराधिकारियों में उसे ही सबसे योग्य समझा जाता है।

रजिया सुल्तान का सिंहासन पर बैठना

अपनी मृत्यु से पूर्व इल्तुतमिश ने अपने बेटों के स्थान पर रजिया को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था। परन्तु उसके कुछ सरदारों को यह कार्य अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि एक महिला उन पर शासन करे। इस कारण उन्होंने इल्तुतमिश के पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोज को सिंहासन पर बैठाया, परन्तु रुकुनुद्दीन फीरोज अत्यन्त विलासी था। उसकी माँ शाहतुर्कान निर्दयी तथा कठोर स्वभाव की महिला थी। फीरोज की विलासिता और शाहतुर्कान के अत्याचारों ने शीघ्र ही अमीरों और जनता को उबा दिया। अतः उन्होंने फीरोज और उसकी माँ को कैद में डाल दिया, वहीं उसकी मृत्यु हो गई। 1236 . में रजिया को सुल्तान बनाया गया।

रजिया सुल्तान की उपलब्धियाँ

सिंहासन पर बैठते ही रजिया को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा मुल्तानबदायूँझाँसी और लाहौर के सूबेदारों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस पर भी रजिया ने साहस से काम लिया।

(1) विद्रोहों का दमन –

रजिया इस बात को जानती थी कि अपने विद्रोहियों को केवल सैनिक शक्ति के द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता, अत: उसने उनमें फूट डाल दी। परिणामस्वरूप उनमें संघर्ष होने लगा, जिससे उनकी शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। इसके पश्चात् उसने सैनिक शक्ति का सहारा लेकर विद्रोहियों का दमन
किया। अनेक विद्रोहियों को पकड़कर मार डाला गया। इस प्रकार रजिया ने कूटनीति से काम लेकर अपने विरोधियों का दमन किया।

(2) शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करना –

प्रारम्भिक युद्धों ने प्रशासनिक व्यवस्था को शिथिल बना दिया था, अत: उसने शासन व्यवस्था को भी सुधारने का प्रयास किया। अपनी स्थिति को दृढ़ करने के लिए ने समस्त उच्च पदों पर अपने विश्वासपात्र अमीरों को नियुक्त किया। ख्वाज राजबुद्दीन को अपना वजीर बनाया। उसने नवीन मुसलमानों को भी उच्च पद प्रदान किया।

(3) विद्रोहियों का वध –

रजिया की शक्ति ज्यों-ज्यों दृढ़ होती गई, त्यों-त्यों तुर्क अमीर उससे घृणा करने लगे। 1237 . में कुछ अमीरों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रजिया ने शाही सेना भेजकर विद्रोहों का कठोरता से दमन. किया। परिणामस्वरूप सम्पूर्ण शासन सत्ता पर उसका अधिकार हो गया।

(4) कबीर खाँ के विद्रोह का अन्त –

1240 . में लाहौर के सूबेदार कबीर खाँ ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रजिया ने साहस नहीं खोया और एक विशाल सेना लेकर लाहौर में कबीर खाँ को पराजित किया। कबीर खाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया।

(5) निरंकुश शासिका के रूप में –

एक इतिहासकार के अनुसार अमीरों की निरंकुशता और विद्रोहात्मक आचरण पर अंकुश लगाना और स्वयं सर्वाधिकार प्राप्त करना रजिया की नीति का मुख्य आधार था। रजिया ने सूबेदारों व अमीरों को अनुशासनबद्ध आज्ञाकारी अनुचर ही समझा। वह अमीरों की शक्ति पर आधारित नहीं रहना चाहती थी। उसका ध्येय पूर्णतया निरंकुश बनना था। इसके लिए उसने प्रयत्न भी आरम्भ कर दिए। उसने स्त्री वेश को त्यागकर पुरुष वेश धारण कर लिया। पर्दा करना छोड़कर वह हाथी पर सवार होकर निकलने लगी। वह दरबार में भी बिना पर्दे के बैठने लगी,

(6) रजिया सुल्तान के विरुद्ध विरोध का आरम्भ –

यद्यपि रजिया ने अपनी चतुराई से राजनीतिक दृढ़ता प्राप्त कर ली थी, परन्तु अब भी अमीर वर्ग उससे असन्तुष्ट था। रजिया से असन्तुष्ट होने के अनेक कारण थे-निरंकुश शासन, परम्पराओं का निर्वाह न करना व स्त्री होना आदि। उसके ये काम मुस्लिम अमीरों के लिए असहनीय थे।

(7) याकूत और रजिया सुल्तान –

रजिया की अलोकप्रियता का महत्त्वपूर्ण कारण याकूत नामक हब्शी गुलाम को अत्यधिक सुविधाएँ प्रदान करना था। रजिया जिस समय घोड़े पर बैठती थी, उस समय याकूत हाथ का सहारा देता था। रजिया के कार्यों से उत्पन्न रोष का लाभ उठाने के लिए इख्तियारुद्दीन आइतीन ने एक संगठन बनाया, जिसमें लाहौर के शासक कबीर खाँ तथा भटिण्डा के शासक अल्लूनिया भी आ मिले। सर्वप्रथम लाहौर की ओर से विद्रोह की ज्वाला भड़की, जिसे रजिया ने दबा दिया।

(8) अल्तूनिया का विद्रोह तथा रजिया सुल्तान का अन्त –

भटिण्डा के शासक अल्तूनिया ने रजिया के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रजिया सेना लेकर विद्रोह को कुचलने के लिए चल दी, परन्तु वह पराजित होकर बन्दी बना ली गई। विद्रोहियों ने दिल्ली में रजिया के भाई बहराम को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया। इसी समय रजिया ने अल्तूनिया को अपने सौन्दर्य से आकर्षित कर स्वयं को बन्दीगृह से मुक्त करा लिया तथा अल्तूनिया की सहायता से उसने दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। 1240 ई. में कैथल के समीप रजिया और बहराम में युद्ध हुआ, जिसमें रजिया पराजित हुई। बहराम से पराजित होकर वह भटिण्डा लौटने को बाध्य हुई। रास्ते में कुछ हिन्दू डाकुओं ने रजिया और अल्तूनिया का वध कर दिया।

रजिया सुल्तान की असफलता के कारण

रजिया के पतन (असफलता) के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

(1) रजिया सुल्तान का स्त्री होना –

रजिया के पतन का प्रमुख कारण उसका स्त्री होना था। मुसलमान सरदार एक स्त्री द्वारा अपने को शासित होना अपमान समझते थे। इस्लाम के अनुसार भी एक स्त्री का शासक होना अनुचित था।

(2) रजिया सुल्तान का मुक्त आचरण –

रजिया के मुक्त आचरण ने भी उसे सरदारों व सूबेदारों का विरोधी बना दिया। उसके द्वारा पर्दा प्रथा का त्याग, पुरुषों की वेशभूषा धारण करना तथा हाथी की सवारी करना इस्लाम के सिद्धान्तों के विरुद्ध था। उसके इस आचरण ने सरदारों व आम जनता को उसका विरोधी बना दिया।

(3) आवश्यकता से अधिक निरंकुशता –

रजिया आवश्यकता से अधिक निरंकुश हो गई थी। उसकी यह निरंकुशता उसके लिए घातक सिद्ध हुई। अधिकांश सरदार उसके खिलाफ हो गए।

(4) जन-सहयोग का प्राप्त न होना –

रजिया को जन-सहयोग भी नहीं मिला। उसके आचरण से सरदार तो नाराज थे ही, आम जनता को भी उसका पुरुष वेशभूषा में घूमना पसन्द नहीं आया।

(5) पारिवारिक तनाव –

यह सत्य है कि इल्तुतमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, परन्तु उसके भाई उसे अपना विरोधी मानते थे तथा सदा उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचते रहते थे। विरोधी सरदार भी भाइयों का साथ देते थे। इस प्रकार रजिया की शक्ति को गहरा आघात पहुंचा।

(6) सरदारों का विश्वासघात –

रजिया को सबसे अधिक आघात उसके सरदारों ने पहुँचाया था। कुछ सरदार अल्तूनिया से जा मिले। अल्तूनिया ने अवसर पाकर रजिया को बन्दी बना लिया।

(7) गुलाम याकूत से प्रेम –

जलालुद्दीन याकूत एक अबीसीनियाई गुलाम था। याकूत ने रजिया को प्रारम्भिक संकटों में अत्यन्त सहयोग दिया था, अत: वह उसका विशेष कृपापात्र हो गया। रणथम्भौर की विजय के पश्चात् रजिया ने उसे ‘अमीर-उल-उमरा’ के पद पर पदोन्नत कर दिया। इस पदोन्नति ने अमीरों को नाराज कर दिया और वे समझने लगे कि रजिया याकूत से प्रेम करती है।

फरिश्ता ने लिखा है, “अन्य अमीर इस पदोन्नति से नाराज हो गए और वे बारीकी से इस पक्षपात का कारण ढूँढने लगे। उन्हें पता चला कि सुल्ताना और याकूत के बीच बड़ा लगाव है। लगाव इतना अधिक है कि जब वह घोड़े पर सवार होती थी, वह उसकी बगल में हाथ डालकर घोड़े पर बैठने में मदद करता था।

इस निकटता, अचानक पदोन्नति और समस्त सल्तनत में प्रथम श्रेणी के पद पर पहुँचने से स्वभावतः किसी भी व्यक्ति की ईर्ष्या को जाग्रत कर दिया होता। यह और अपमानजनक तब बन गई जबकि वह चहेता अबीसीनियाई गुलाम मात्र था।”

रजिया सुल्तान के चरित्र का मूल्यांकन

रजिया के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव लिखते हैं, “इल्तुतमिश के वंश में रजिया प्रथम तथा अन्तिम सुल्तान थी, जिसने केवल अपनी योग्यता और चरित्र बल से दिल्ली सल्तनत की राजनीति पर अधिकार रखा।”

इल्तुतमिश ने रजिया के विषय में अमीरों से कहा था, “मेरे पुत्र यौवन के भोग-विलास में लिप्त हैं और उनमें से कोई भी सुल्तान होने के योग्य नहीं है और मेरी मृत्यु के उपरान्त आप देखेंगे कि राज्य का संचालन करने के लिए मेरी पुत्री (रजिया) से अधिक योग्य कोई व्यक्ति नहीं है।”

(1) विभिन्न गुणों से युक्त –

तत्कालीन इतिहासकार मिन्हाज ने लिखा है, “वह महान् शासिका, बुद्धिमान, ईमानदार, उदार, शिक्षा की पोषक, न्यायवादी, प्रजापालक तथा युद्धप्रिय थी। उसमें वे सभी प्रशंसनीय गुण थे, जो राजा में होने चाहिए।”

(2) कुशल शासिका –

यद्यपि रजिया एक स्त्री थी, तथापि वह एक कुशलं शासिका थी। उसने शासन की समस्त सत्ता को अपने हाथों में ही रखा तथा बड़ी कुशलता के साथ अपने विद्रोहियों का दमन किया। वह बिना पर्दे के दरबार में बैठकर सभी शासकीय विभागों का निरीक्षण करती थी तथा फरियादियों की प्रार्थना सुनकर न्याय करती थी।

(3) वीर और साहसी –

यद्यपि वह एक स्त्री थी, परन्तु उसमें साहस और वीरता की कमी नहीं थी। वह बड़ी निर्भयता से युद्धों का संचालन करती थी तथा बड़ी निडरता के साथ उसने अपने विरोधियों का दमन किया।

(4) महान् कूटनीतिज्ञ –

रजिया केवल साहसी योद्धा मात्र न थी, वरन् एक महान् कूटनीतिज्ञ तथा चतुर स्त्री थी। वह जानती थी कि प्रत्येक स्थान पर सैनिक शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। इस नीति के आधार पर ही उसने अपने विरोधियों में फूट डलवा दी। उसने अपने विरोधियों को कभी भी संगठित नहीं होने दिया। जब अल्तूनिया ने उसे बन्दी बना लिया, तो उसने बड़ी चतुराई से उसे अपने प्रेमपाश में फँसाकर स्वयं को बन्दीगृह से मुक्त करा लिया।

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