उसने कहा था कहानी की समीक्षा

उसने कहा था कहानी की समीक्षा || चंद्रधर शर्मा गुलेरी ||

उसने कहा था कहानी की समीक्षा | Usne kaha tha kahani ki sameeksha

लेखक – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

उसने कहा था कहानी की समीक्षा : उसने कहा था कहानी चंद्रधर शर्मा गुलेरी की हिंदी के पहली सर्वोत्तम कहानी मानी जाती है । यह कहानी बहुत ही मार्मिक है । इस कहानी की मूल संवेदना यह है कि, इस संसार में कुछ ऐसे महान निःस्वार्थ व्यक्ति होते हैं जो किसी के कहे को पूरा करने के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान कर देते हैं।

उसने कहा था’ कहानी का पात्र लहना सिंह ऐसा ही व्यक्ति है। लहना सिंह ने अपने प्राण देकर बोधा सिंह और हजारा सिंह के प्राण की रक्षा की। ऐसा लहना सिंह ने सूबेदारनी के मात्र ‘उसने कहा था’ वाक्य को ध्यान में रखकर प्राणोत्सर्ग किया था। जो ‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई’ को चरितार्थ करता है | उसने कहा था’ कहानी का शीर्षक भी है जो शीर्षक को सार्थकता प्रदान करता है ।

वर्णन शैली/शिल्प कथानक

कथानक किसी भी कहानी का महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना जाता है। कथानक का निर्माण घटनाओं तथा पात्रों के पारस्परिक संयोग से होता है। जो द्वंद्व रूप में परिवेश में विद्यमान रहती है और जिसको साहित्यकार कार्य-कारण सम्बन्ध पर विकसित करता है।

उसने कहा था’ कहानी का कथानक 5 अंकों में विभाजित है। इसका कथानक लहना सिंह के त्याग और बलिदान पर आधारित है ।

वह माझे का एक सिक्ख है, वह ‘सिक्ख राइफल्स’ की कुछ टुकड़ियों को भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध करने के लिए फ्रांस और बेल्जियम भेजती है। ये सैनिक, खंदकों में कड़ाके की ठण्ड में रहते हैं । सूबेदार हजारा सिंह, उसका बेटा बोधा सिंह, लहना सिंह, वजीरा सिंह, महासिंह, उदमी सिंह, आदि सिक्ख सैनिक अंग्रेज लेफ्टिनेंट के नेतृत्व में लड़ रहे हैं ।

एक दिन एक जर्मन अंग्रेज लेफ्टिनेंट के वेश में आकर सूबेदार हजारा सिंह से कहता है कि, मील भर दूर एक जर्मन खाई पर धावा करना है । वह दस सैनिक को यहां छोड़कर बाकी सैनिकों को लेकर वहां धावा करें और खंदक छीनकर वहीँ तब तक डटे रहे जब तक दूसरा हुक्म न मिले ।

पीछे लहना सिंह, बोधा सिंह और कुछ सैनिक रह गए । जैसे ही लेफ्टिनेंट ने कहा कि, सिगरेट पिओगे तो लहना सिंह समझ गया कि, यह उनका अंग्रेज लेफ्टिनेंट नहीं है, या तो वह मारा गया है या वह पकड़ा गया है ।

उसके स्थान पर यह कोई जर्मन वेश बदलकर आ गया है । वह उसकी चाल समझ जाता है, और तुरंत वजीर सिंह को सारी बात समझा कर सूबेदार के पीछे भेजता है और वे सकुशल लौट आते हैं और वे जर्मन सैनिकों पर दोनों ओर से धावा बोल देते हैं । सब जर्मन मर जाते हैं, लहना सिंह की पसलियों में भी गहरा घाव लगता है ।

उसने कहा था कहानी

पात्र और चरित्र चित्रण :-

पात्र और चरित्र चित्रण कहानी का दूसरा प्रमुख तत्व माना जाता है । क्योंकि पात्र और चरित्र चित्रण कहानी को गतिशीलता प्रदान करते हैं । आधुनिक कहानियों में कहानीकार का ध्यान मुख्य रूप से चरित्र चित्रण पर ही केंद्रित रहता है ।

उसने कहा था’ कहानी का मुख्य पात्र ‘ लहना सिंह’ है । वह पाठक के ह्रदय पटल पर सदैव के लिए अंकित हो जाता है । सूबेदार हजारा सिंह, बोधा सिंह, वजीरा सिंह, आदि उल्लेखनीय पात्र हैं ।

लहना सिंह में प्रेम, त्याग, बलिदान, विनोद वृत्ति, बुद्धिमत्ता एवं सतर्कता आदि विविध गुण मिलते हैं । अगर उसमें बुद्धिमत्ता बौर सतर्कता न होती तो पूरी सेना की टुकड़ी मार दी जाती और कहानी बनती ही नहीं । अगर उसमें प्रेम और त्याग नहीं होता तो लहना सिंह का बलिदान नहीं हुआ होता ।

लहना सिंह सूबेदार से कहता है –

बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है, बिना लड़े सिपाही, मुझे तो संगीन चढ़कर मार्च का हुकुम मिल जाए फिर सात जर्मनों को मारकर अकेला न लौटूँ तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो । उस दिन धावा किया था, चार मील तक एक भी जर्मन नहीं छोड़ा।’

लहना सिंह जर्मन लफ्टिनेंट को पहचान कर बुद्धिमत्ता का परिचय भी देता है । बीमार बोधा सिंह को अपने दोनों कम्बल ओढ़ा देता है और ओवर कोट, जर्सी भी पहना देता है और स्वयं ठण्ड खाता है उसकी सबसे बड़ी विशेषता यही त्याग और बलिदान की भावना है ।

संवाद (कथोपकथन)

संवाद कहानी में अहम् भूमिका निभाते हैं । संवाद के माध्यम से कथानक को गतिशीलता मिलती है, जिसमें पात्र और चरित्र-चित्रण की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है । कहानी में संवाद छोटे-छोटे एवं पात्रानुकूल होने चाहिए ।

उसने कहा था’ कहानी में अधिकांश विकास संवादों के माध्यम से ही किया गया है । इस कहानी की शुरुआत किशोरावस्था के प्रेम के आकर्षण से शुरू होती है और अंतिम परिणति त्याग एवं बलिदान के संवादों के दुरुखान्त से शुरू होती है । उदाहरण –

‘तेरे घर कहाँ है ?”
”मगरे में, और तेरे?”
”मांझे में, यहां कहाँ रहती है ?”
”अमृतसर की बैठक में, वहां मेरे मामा होते हैं ।”
”मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार में है ।”

लपटन साहब के साथ, लहना सिंह के साथ, लहना सिंह के संवाद का वर्णन इस प्रकार है –

‘क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएंगे?
‘लड़ाई ख़त्म होने पर । क्यों ? क्या यह संदेश पसंद नहीं’?
‘नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहां कहाँ ?’

लहना सिंह और किरात सिंह के बीच संवाद का वर्णन –

सैनिकों के परस्पर हँसी-मजाक के संवाद कहानी को बहुत रोचक बनाते हैं । वजीर सिंह, बाल्टी फेंकता हुआ मजाक में कहता है – मैं पौधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण।’

देशकाल या वातावरण

कहानी का कथानक देशकाल/वातावरण में ही आकार ग्रहण करता है । परिवेश के बिना कथा का विकास संभव नहीं होता है क्योंकि, साहित्यकार अपने परिवेश से कथा सूत्र ग्रहण कर उसे अपनी कल्पना तत्त्व के आधार पर विकसित करता है । कहानी का वातावरण बनाने में लेखक पूर्ण रूप से सफल रहा है ।

आरंभ में अमृतसर में चलने वाले बाबू कोर्ट वालों की मधुर वार्तालाप का वर्णन है और यह बताया गया कि, दूसरे शहरों के इक्के वाले जहाँ कर्कश और अश्लील शब्दों में रास्ता साफ़ करते-कराते, घोड़ों को सम्बोधित करते हैं, वहीं अमृतसर के ये लोग तंग -चक्करदार गलियों में भी सब्र और प्रेम का समुद्र उमड़ा देते हैं ।

जैसे – क्यों खालसा जी ? हटो भाई, ठहरो भाई, आने दो लाला जी, हटो बाछा आदि कहकर अपना रास्ता बनाते हैं । ‘उसने कहा था’ कहानी में फ्रांस में युद्ध का वातावरण कहानी के प्रभाव को बहुत गहरा देता है ।

भाषा-शैली

भाषा-शैली की दृष्टि से भी यहाँ कहानी बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस समय यह कहानी प्रकाश में आई तब तक प्रेमचंद और प्रसाद ने कहानी में इतना विकास नहीं किया था । उस समय इतने परिपक़्व सब के लिए आश्चर्य का कारण था ।

डॉ. नगेंद्र जैसे प्रसिद्ध समीक्षक भी कहानी को अपने समय से 35-36 वर्ष आगे की कहानी स्वीकार करते हैं ।

उद्देश्य

प्रत्येक कहानी का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य ही होता है। कोई भी कहानी निरुद्देश्य नहीं लिखी जाती है। इसलिए उद्देश्य का होना आवश्यक है ।
इस कहानी का उद्देश्य निस्वार्थ, त्यागी, वीर, बलिदान, व्यक्तियों को श्रद्धांजलि देना है ।

अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन जो दूसरों के लिए मरते हैं, ऐसे व्यक्ति विरले ही होते हैं, लेकिन होते अवश्य हैं । माझे का लहना सिंह ऐसा ही व्यक्ति है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस कहानी का उद्देश्य जीवन में मानवीय मूल्यों की स्थापना के साथ-साथ कर्त्तव्य के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले वीर व्यक्ति के चरित्र का गुणगान करना है।

गुलेरी जी की साहित्य रचना का उद्देश्य राष्ट्र-उत्थान तथा प्रगति पथ पर देश को ले जाना था । ‘उसने कहा था’ कहानी जहाँ त्याग, वीरता, बलिदान की प्रेरणा से ओत-प्रोत है । वहां ‘सुखमय जीवन’ कहानी में तात्कालीन परिस्तिथियों में भारतीय राजनीति पर और समाज में व्याप्त पाखण्ड का यथार्थ चित्रण है ।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि, उसने कहा था’ कहानी कला की दृष्टि से एक बहुत ही सफल कहानी है । जिसमें लहना सिंह के माध्यम से लेखक ने निश्छल प्रेम, प्रण पालक, त्याग बलिदान आदि का सन्देश दिया है । वास्तव में इसकी कहानी कला के कारण ही हिंदी के कुछ समीक्षक ‘उसने कहा था’ कहानी को हिंदी की पहली आधुनिक कहानी होने का गौरव देते हैं ।

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