भौतिक विज्ञान • कक्षा 12

भौतिकी

NCERT पाठ्यपुस्तक14 अध्याय

अध्याय नोट्स

भौतिकी में आप क्या सीखेंगे

भौतिकी का त्वरित रिवीज़न मैप — हर अध्याय का मूल विचार और पाँच मुख्य बातें। पूरा NCERT PDF और विस्तृत नोट्स पढ़ने के लिए किसी भी अध्याय पर टैप करें।

01

वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 1, "वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र", स्थिरवैद्युतिकी की नींव रखते हुए बताता है कि वैद्युत आवेश कैसे उत्पन्न होते हैं, बिंदु-आवेशों के बीच बल के लिए कूलॉम का नियम, वैद्युत क्षेत्र और क्षेत्र-रेखाओं की अवधारणा, वैद्युत फ्लक्स, गाउस का नियम तथा वैद्युत द्विध्रुव।

  • 1वैद्युत आवेश दो प्रकार के होते हैं — धनात्मक और ऋणात्मक; समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित और असमान आवेश एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
  • 2आवेश संरक्षित होता है (न बनाया जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है), योज्य होता है (आवेशों का बीजीय योग होता है) और क्वांटमीकृत होता है: q = ne जहाँ e = 1.602 × 10⁻¹⁹ C।
  • 3कूलॉम का नियम: निर्वात में r दूरी पर स्थित दो बिंदु-आवेशों q₁ और q₂ के बीच स्थिरवैद्युत बल F = (1/4πε₀)(q₁q₂/r²) होता है, जहाँ ε₀ = 8.854 × 10⁻¹² C² N⁻¹ m⁻²।
  • 4किसी बिंदु पर वैद्युत क्षेत्र E वहाँ रखे एकांक धनात्मक परीक्षण आवेश पर लगने वाला बल है; बिंदु-आवेश Q के लिए E = (1/4πε₀)(Q/r²)। क्षेत्र-रेखाएँ धनात्मक आवेश से आरंभ होकर ऋणात्मक आवेश पर समाप्त होती हैं और कभी नहीं काटतीं।
  • 5गाउस के नियम के अनुसार किसी भी बंद पृष्ठ से कुल वैद्युत फ्लक्स q/ε₀ के बराबर होता है, जहाँ q अंदर का कुल आवेश है — यह सममित आवेश वितरण के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है।
02

स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 2, "स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता", स्थिरवैद्युत विभव और धारिता की व्याख्या करता है — यह बताता है कि वैद्युत विभव, अनंत से किसी बिंदु तक एकांक धनात्मक आवेश लाने में किया गया कार्य है, और संधारित्र C = Q/V के संबंध से ऊर्जा किस प्रकार संचित करते हैं।

  • 1किसी बिंदु पर स्थिरवैद्युत विभव वह कार्य है जो किसी बाहरी बल द्वारा एकांक धनात्मक आवेश को अनंत से उस बिंदु तक बिना त्वरण के लाने में किया जाता है, जहाँ अनंत पर विभव शून्य मान लिया जाता है।
  • 2r दूरी पर बिंदु-आवेश Q के कारण विभव V = Q/(4πε₀r) होता है; द्विध्रुव के लिए यह 1/r² के अनुसार घटता है और द्विध्रुव आघूर्ण के साथ कोण पर निर्भर करता है।
  • 3समविभव पृष्ठ सदैव वैद्युत क्षेत्र के लंबवत होते हैं; किसी आवेश को समविभव पृष्ठ पर ले जाने में कोई कार्य नहीं होता।
  • 4चालक के भीतर वैद्युत क्षेत्र शून्य होता है, विभव पूरे में नियत रहता है, और कोई भी अतिरिक्त आवेश केवल बाहरी पृष्ठ पर स्थित रहता है (गुहाओं पर स्थिरवैद्युत परिरक्षण लागू होता है)।
  • 5धारिता C = Q/V केवल ज्यामिति पर निर्भर करती है; समांतर पट्टिका संधारित्र के लिए C = ε₀A/d, और K परावैद्युतांक वाला परावैद्युत डालने पर C = Kε₀A/d हो जाती है।
03

विद्युत धारा

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 3, "विद्युत धारा", चालकों में विद्युत आवेश के प्रवाह, ओम का नियम (V = RI), प्रतिरोधकता, इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग, किरखहोफ के नियम तथा व्हीटस्टोन सेतु जैसे परिपथ-विश्लेषण उपकरणों को समझाता है।

  • 1विद्युत धारा को अनुप्रस्थ-काट से प्रति एकांक समय में प्रवाहित कुल आवेश के रूप में परिभाषित किया जाता है: स्थिर धारा के लिए I = Q/t और तात्क्षणिक I = lim(ΔQ/Δt) जब Δt→0।
  • 2ओम का नियम: V = RI, जहाँ प्रतिरोध R = ρl/A; प्रतिरोधकता ρ पदार्थ और ताप पर निर्भर करती है, न कि चालक के आयामों पर।
  • 3वैद्युत क्षेत्र E के अंतर्गत इलेक्ट्रॉनों का अपवाह वेग vd = –eEτ/m होता है, जहाँ τ श्रांति (औसत संघट्ट) काल है, जिससे चालकता σ = ne²τ/m प्राप्त होती है।
  • 4धातुओं की प्रतिरोधकता ताप के साथ बढ़ती है (ρT = ρ0[1 + α(T – T0)]), जबकि अर्धचालकों की प्रतिरोधकता ताप बढ़ने पर घटती है।
  • 5EMF ε और आंतरिक प्रतिरोध r वाले सेल को बाहरी प्रतिरोध R से जोड़ने पर धारा I = ε/(R + r) और टर्मिनल वोल्टता V = ε – Ir होती है।
04

गतिमान आवेश और चुंबकत्व

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 4, "गतिमान आवेश और चुंबकत्व", यह बताता है कि विद्युत धाराएँ और गतिमान आवेश चुंबकीय क्षेत्र कैसे उत्पन्न करते हैं, और चुंबकीय क्षेत्र गतिमान आवेशों तथा धारावाही चालकों पर बल कैसे लगाते हैं — ये सब लॉरेंज बल, बायो-सावर्त नियम और ऐम्पियर के परिपथीय नियम द्वारा शासित होते हैं।

  • 1v वेग से गतिमान q आवेश पर चुंबकीय क्षेत्र B में लॉरेंज बल F = q(v × B) होता है, जो सदैव v के लंबवत होता है, इसलिए चुंबकीय बल कण पर कोई कार्य नहीं करता।
  • 2एकसमान चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत गतिमान आवेशित कण r = mv/qB त्रिज्या के वृत्तीय पथ पर चलता है; साइक्लोट्रॉन आवृत्ति ν = qB/2πm कण की चाल से स्वतंत्र होती है।
  • 3बायो-सावर्त नियम: dB = (μ₀/4π)(I dl × r̂)/r², जो किसी अत्यल्प धारा तत्व से चुंबकीय क्षेत्र का योगदान देता है; R त्रिज्या के वृत्तीय लूप के केंद्र पर क्षेत्र B = μ₀I/2R होता है।
  • 4ऐम्पियर का परिपथीय नियम (∮B·dl = μ₀I) लंबे सीधे तार के बाहर B = μ₀I/2πR और n घुमाव प्रति एकांक लंबाई वाली लंबी परिनालिका के भीतर B = μ₀nI देता है।
  • 5समांतर धाराएँ एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं और विपरीत धाराएँ प्रतिकर्षित करती हैं; यही अन्योन्यक्रिया धारा के SI मात्रक — ऐम्पियर — को परिभाषित करती है।
05

चुंबकत्व एवं द्रव्य

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 5, "चुंबकत्व एवं द्रव्य", छड़ चुंबक के गुणों, चुंबकत्व के लिए गाउस के नियम, चुंबकन, चुंबकीय तीव्रता तथा पदार्थों के प्रतिचुंबकीय, अनुचुंबकीय एवं लौहचुंबकीय वर्गीकरण को समझाता है।

  • 1छड़ चुंबक एक चुंबकीय द्विध्रुव की तरह कार्य करता है; r >> l के लिए अक्षीय क्षेत्र B = μ₀·2m / (4πr³) और निरक्षीय क्षेत्र B = –μ₀m / (4πr³) होता है।
  • 2चुंबकत्व के लिए गाउस का नियम: किसी भी बंद पृष्ठ से होकर जाने वाला कुल चुंबकीय फ्लक्स शून्य होता है (∮ B·dS = 0), क्योंकि एकाकी चुंबकीय एकध्रुव का अस्तित्व नहीं होता।
  • 3चुंबकन M प्रति एकांक आयतन कुल चुंबकीय आघूर्ण है; पदार्थ में कुल क्षेत्र B = μ₀(H + M) होता है, जहाँ H चुंबकीय तीव्रता है।
  • 4चुंबकीय प्रवृत्ति χ, M और H को M = χH से संबंधित करती है; सापेक्ष पारगम्यता μr = 1 + χ और पारगम्यता μ = μ₀μr होती है।
  • 5प्रतिचुंबकीय पदार्थ (जैसे — बिस्मथ, ताँबा, जल) चुंबकों द्वारा प्रतिकर्षित होते हैं (χ < 0); अनुचुंबकीय पदार्थ (जैसे — ऐलुमिनियम, ऑक्सीजन) दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं (χ अल्प एवं धनात्मक)।
06

वैद्युतचुंबकीय प्रेरण

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 6, "वैद्युतचुंबकीय प्रेरण", उस परिघटना को समझाता है जिसमें परिवर्तित चुंबकीय क्षेत्र बंद कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित करता है — जिसे माइकल फैराडे और जोसेफ हेनरी ने लगभग 1830 में खोजा था और जिसे फैराडे के नियम द्वारा व्यक्त किया जाता है: ε = −N(dΦB/dt)।

  • 1वैद्युतचुंबकीय प्रेरण: जब भी कुंडली से होकर जाने वाला चुंबकीय फ्लक्स समय के साथ बदलता है, उसमें विद्युत धारा प्रेरित होती है (फैराडे, हेनरी, ~1830)।
  • 2फैराडे का नियम: प्रेरित emf ε = −N(dΦB/dt); एकल-फेरे परिपथ के लिए ε = −dΦB/dt, जहाँ चुंबकीय फ्लक्स ΦB = BA cos θ (SI मात्रक: वेबर, Wb)।
  • 3लेंज़ का नियम: प्रेरित धारा उस दिशा में प्रवाहित होती है जो उसे उत्पन्न करने वाले चुंबकीय फ्लक्स परिवर्तन का विरोध करे — यह ऊर्जा संरक्षण के सुसंगत है।
  • 4गतिज emf: एकसमान क्षेत्र B के लंबवत वेग v से गतिमान l लंबाई का चालक अपने सिरों पर emf ε = Blv विकसित करता है।
  • 5परिनालिका का स्व-प्रेरकत्व L: L = μr μ0 n² Al; स्व-प्रेरित emf ε = −L(dI/dt); संचित ऊर्जा W = ½LI²; अन्योन्य प्रेरकत्व M के लिए ε1 = −M(dI2/dt)।
07

प्रत्यावर्ती धारा

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 7, "प्रत्यावर्ती धारा", उस धारा को समझाता है जिसका परिमाण और दिशा समय के साथ ज्यावक्रीय रूप से बदलती है — यह विद्युत शक्ति में इसलिए प्रमुख है क्योंकि ट्रांसफॉर्मर की सहायता से AC वोल्टेज को सुगमता से घटाया-बढ़ाया जा सकता है, जिससे दूर तक किफायती संचरण संभव होता है।

  • 1शुद्ध प्रतिरोधक में वोल्टेज और धारा समान कला में होते हैं; rms धारा I = im/√2 = 0.707 im और rms वोल्टेज V = vm/√2 = 0.707 vm।
  • 2शुद्ध प्रेरक में धारा, वोल्टेज से π/2 पीछे रहती है; प्रेरकीय प्रतिघात XL = ωL (मात्रक: ओम); पूर्ण चक्र पर औसत शक्ति शून्य।
  • 3शुद्ध संधारित्र में धारा, वोल्टेज से π/2 आगे रहती है; संधारित्री प्रतिघात XC = 1/ωC (मात्रक: ओम); पूर्ण चक्र पर औसत शक्ति शून्य।
  • 4श्रेणी LCR परिपथ में प्रतिबाधा Z = √[R² + (XC − XL)²] और अनुनाद ω₀ = 1/√LC पर होता है, जहाँ धारा आयाम अधिकतम होता है (im = vm/R)।
  • 5AC परिपथ में औसत शक्ति P = VI cos φ, जहाँ cos φ शक्ति गुणांक है; शुद्ध प्रेरकीय या संधारित्री परिपथ में cos φ = 0 अर्थात् नेट शक्ति शून्य (वाटहीन धारा)।
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वैद्युतचुंबकीय तरंगें

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 8, "वैद्युतचुंबकीय तरंगें", युग्मित दोलायमान विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों की उन तरंगों को समझाता है जो निर्वात में प्रकाश की चाल (3×10⁸ m/s) से संचरित होती हैं, मैक्सवेल के समीकरणों से उत्पन्न होती हैं और त्वरित आवेशों द्वारा उत्सर्जित की जाती हैं।

  • 1मैक्सवेल ने विस्थापन धारा (id = ε₀ dΦE/dt) प्रस्तुत की ताकि आवेशित संधारित्र पर लागू होने पर ऐम्पियर के परिपथीय नियम की असंगति दूर हो।
  • 2त्वरित आवेश (स्थिर या एकसमान गतिशील नहीं) वैद्युतचुंबकीय तरंगें उत्पन्न करते हैं; तरंग की आवृत्ति आवेश दोलन की आवृत्ति के बराबर होती है।
  • 3वैद्युतचुंबकीय तरंग में E और B एक-दूसरे के तथा संचरण दिशा के लंबवत होते हैं और E₀/B₀ = c से संबंधित होते हैं।
  • 4निर्वात में वैद्युतचुंबकीय तरंगों की चाल c = 1/√(μ₀ε₀) ≈ 3×10⁸ m/s; माध्यम में v = 1/√(με) हो जाती है।
  • 5हर्ट्ज़ ने 1887 में पहली बार वैद्युतचुंबकीय तरंगों का प्रायोगिक प्रदर्शन किया; जगदीश चंद्र बोस ने बाद में लघुतर तरंगदैर्ध्य (25 mm से 5 mm) की वैद्युतचुंबकीय तरंगें उत्पन्न कीं।
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किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 9, "किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र", परावर्तन, अपवर्तन, पूर्ण आंतरिक परावर्तन और वर्ण-विक्षेपण के माध्यम से प्रकाश के व्यवहार की व्याख्या करता है, और यह दर्शाता है कि इन सिद्धांतों का उपयोग करके दर्पण, लेंस, प्रिज़्म, सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी जैसे प्रकाशिक यंत्र निर्मित किए जाते हैं।

  • 1दर्पण समीकरण है 1/v + 1/u = 1/f, और गोलीय दर्पण की फोकस दूरी f = R/2 होती है, जहाँ R वक्रता त्रिज्या है।
  • 2पूर्ण आंतरिक परावर्तन तब होता है जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाता है और आपतन कोण क्रांतिक कोण ic से अधिक हो जाता है, जहाँ sin ic = n21; प्रकाशिक तंतु इस प्रभाव का उपयोग प्रकाश को नगण्य क्षति के साथ लंबी दूरियों तक संचारित करने में करते हैं।
  • 3लेंस निर्माता का सूत्र फोकस दूरी को अपवर्तनांक और वक्रता त्रिज्याओं से जोड़ता है: 1/f = ((n2 - n1)/n1)(1/R1 - 1/R2); लेंस की क्षमता P = 1/f, जिसे डायॉप्टर (D) में मापते हैं।
  • 4सम्पर्क में रखे पतले लेंसों के संयोजन के लिए 1/f = 1/f1 + 1/f2 + ... और कुल क्षमता P = P1 + P2 + P3 + ...
  • 5संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में अल्प फोकस दूरी का अभिदृश्यक लेंस आवर्धित वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है और नेत्रिका इसे पुनः आवर्धित करती है; जब अंतिम प्रतिबिंब अनंत पर बने, तब कुल आवर्धन m = (L/fo)(D/fe) होता है।
10

तरंग-प्रकाशिकी

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 10, "तरंग-प्रकाशिकी", हाइगेंस के सिद्धांत, प्रकाश की तरंग प्रकृति तथा व्यतिकरण, विवर्तन और ध्रुवण की घटनाओं को समाहित करता है और यह स्पष्ट करता है कि प्रकाश एक अनुप्रस्थ विद्युतचुंबकीय तरंग के रूप में किस प्रकार व्यवहार करता है।

  • 1हाइगेंस का सिद्धांत: तरंगाग्र के प्रत्येक बिंदु से द्वितीयक तरंगिकाएँ उत्पन्न होती हैं; इन तरंगिकाओं का अग्रमुखी आवरण किसी बाद के समय में नए तरंगाग्र की स्थिति देता है।
  • 2स्नेल का नियम (n₁ sin i = n₂ sin r) हाइगेंस के सिद्धांत से व्युत्पन्न होता है; अपवर्तन पर प्रकाश अभिलंब की ओर मुड़ता है तो दूसरे माध्यम में उसकी चाल कम होती है — यह तरंग मॉडल की पुष्टि करता है और न्यूटन के कणिका मॉडल को असत्य सिद्ध करता है।
  • 3यंग का द्वि-झिरी प्रयोग (1801) प्रकाश की तरंग प्रकृति को स्थापित करता है; दीप्त फ्रिंजें वहाँ बनती हैं जहाँ पथांतर nλ (संपोषी व्यतिकरण) हो और अदीप्त फ्रिंजें वहाँ जहाँ पथांतर (n + ½)λ (विनाशी व्यतिकरण) हो।
  • 4एकल-झिरी विवर्तन में एक विस्तृत केंद्रीय उच्चिष्ठ बनता है और तीव्रता न्यूनतम उन कोणों θ पर होती है जहाँ sin θ = nλ/a (n = ±1, ±2, …), तथा उनके बीच क्रमशः दुर्बल होते द्वितीयक उच्चिष्ठ होते हैं।
  • 5प्रकाश एक अनुप्रस्थ विद्युतचुंबकीय तरंग है; ध्रुवक केवल अपनी पारण-अक्ष की दिशा के विद्युत क्षेत्र घटक को पारित करता है, जिससे अध्रुवित प्रकाश की तीव्रता आधी हो जाती है। जब ध्रुवित प्रकाश किसी दूसरे ध्रुवक से θ कोण पर गुज़रे, तो तीव्रता मेलस के नियम से मिलती है: I = I₀ cos²θ।
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विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 11, "विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति", प्रकाश-विद्युत प्रभाव, आइंस्टीन के फोटॉन सिद्धांत और दे-ब्रॉग्ली की परिकल्पना को समाहित करता है, जिसके अनुसार गतिशील कणों में तरंग के समान गुण होते हैं जिन्हें संबंध λ = h/p से व्यक्त किया जाता है।

  • 1कार्य-फलन (φ₀) वह न्यूनतम ऊर्जा है जो किसी इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकलने के लिए चाहिए; यह धातु के अनुसार बदलती है और इलेक्ट्रॉन वोल्ट में मापी जाती है (1 eV = 1.602 × 10⁻¹⁹ J)।
  • 2प्रकाश-विद्युत धारा आपतित प्रकाश की तीव्रता के सीधे समानुपाती होती है, किंतु उत्सर्जित प्रकाश-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा केवल प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है, तीव्रता पर नहीं।
  • 3देहली आवृत्ति ν₀ = φ₀/h से नीचे कोई प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नहीं होता, चाहे आपतित विकिरण कितनी भी तीव्र हो; देहली से ऊपर उत्सर्जन तात्क्षणिक (~10⁻⁹ s के भीतर) होता है।
  • 4आइंस्टीन का प्रकाश-विद्युत समीकरण Kmax = hν − φ₀ (तुल्यतः eV₀ = hν − φ₀) प्रकाश-विद्युत प्रभाव के सभी प्रेक्षित लक्षणों की व्याख्या करता है और मिलिकन ने इसे प्रयोगात्मक रूप से सत्यापित किया।
  • 5प्रत्येक फोटॉन में ऊर्जा E = hν और संवेग p = hν/c होता है; फोटॉन विद्युतीय रूप से उदासीन होते हैं और प्रकाश की चाल से चलते हैं।
12

परमाणु

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 12, "परमाणु", परमाणु के विभिन्न मॉडलों को समाहित करता है — थॉमसन के प्लम-पुडिंग मॉडल और रदरफोर्ड के नाभिकीय मॉडल (स्वर्ण-पर्ण α-कण प्रकीर्णन प्रयोग से प्राप्त) से बोर के क्वांटीकृत कक्षा मॉडल तक, जो हाइड्रोजन परमाणु के विविक्त रेखा स्पेक्ट्रम और 13.6 eV आयनन ऊर्जा की सफलतापूर्वक व्याख्या करता है।

  • 1रदरफोर्ड का α-कण प्रकीर्णन प्रयोग (गाइगर-मार्सडेन, 1911) 5.5 MeV के α-कणों को पतली स्वर्ण-पर्ण पर आपतित करता था; लगभग 8000 में से केवल 1 ही 90° से अधिक विक्षेपित हुआ, जिससे सिद्ध हुआ कि नाभिक अत्यंत छोटा (~10⁻¹⁵ m) और सघन है।
  • 2बोर का प्रथम अभिगृहीत: इलेक्ट्रॉन स्थायी स्थिर कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं और विकिरण उत्सर्जित नहीं करते, जो शास्त्रीय विद्युतचुंबकीय सिद्धांत के विपरीत है।
  • 3बोर का द्वितीय अभिगृहीत: परिक्रमा करते इलेक्ट्रॉन का कोणीय संवेग क्वांटीकृत है — L = nh/2π, जहाँ n मुख्य क्वांटम संख्या है।
  • 4बोर का तृतीय अभिगृहीत: जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा अवस्था से निम्न ऊर्जा अवस्था में संक्रमण करता है, तो आवृत्ति ν का फोटॉन उत्सर्जित होता है, जहाँ hν = Ei − Ef।
  • 5हाइड्रोजन में n-वीं कक्षा की ऊर्जा En = −13.6/n² eV है; भूमि अवस्था (n = 1) की ऊर्जा −13.6 eV है, इसलिए आयनन ऊर्जा 13.6 eV होती है।
13

नाभिक

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 13, "नाभिक", परमाणु नाभिकों की संरचना, संघटन और गुणधर्मों को समाहित करता है, जिसमें नाभिकीय बल, रेडियोऐक्टिवता, बंधन ऊर्जा तथा विखंडन और संलयन के माध्यम से ऊर्जा मोचन की व्याख्या की गई है।

  • 1परमाणु नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन (नाभिकीय कण) होते हैं; इसकी त्रिज्या R = R0A^(1/3) से मिलती है जहाँ R0 = 1.2 fm, और नाभिकीय घनत्व लगभग 2.3 × 10¹⁷ kg/m³ होता है, जो द्रव्यमान संख्या A से स्वतंत्र है।
  • 2द्रव्यमान दोष ΔM = [Zmp + (A−Z)mn] − M से नाभिकीय बंधन ऊर्जा Eb = ΔMc² प्राप्त होती है; प्रति नाभिकीय कण बंधन ऊर्जा A = 56 (लोहा) के निकट अधिकतम लगभग 8.75 MeV होती है।
  • 3नाभिकीय बल अल्प-परासीय है, कूलॉम बल से बहुत अधिक प्रबल है, और न्यूट्रॉन-न्यूट्रॉन, प्रोटॉन-न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन-प्रोटॉन युगलों के बीच समान रूप से कार्य करता है।
  • 4रेडियोऐक्टिवता में तीन प्रकार के क्षय होते हैं: α-क्षय (हीलियम नाभिक उत्सर्जित), β-क्षय (इलेक्ट्रॉन या पॉज़िट्रॉन उत्सर्जित) और γ-क्षय (उच्च-ऊर्जा फोटॉन उत्सर्जित)।
  • 5U-235 का नाभिकीय विखंडन प्रति विखंडित नाभिक लगभग 200 MeV ऊर्जा मोचित करता है — एक सामान्य रासायनिक अभिक्रिया से लगभग दस लाख गुना अधिक।
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अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ

कक्षा 12 भौतिकी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का अध्याय 14, "अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ", आंतरिक और बाह्य अर्धचालकों, p-n संधि के निर्माण, अग्र और पश्च अभिनति के अंतर्गत डायोड के व्यवहार, तथा AC को DC में परिवर्तित करने वाले दिष्टकारी परिपथों को समाहित करता है।

  • 1अर्धचालकों (Si, Ge) में छोटा ऊर्जा बैंड अंतराल (Eg < 3 eV) होता है, जो कमरे के तापमान पर इलेक्ट्रॉनों को संयोजकता बैंड से चालन बैंड में ऊष्मीय उत्तेजना की अनुमति देता है।
  • 2आंतरिक अर्धचालकों में ne = nh = ni; उत्पाद nenh = ni² सभी अर्धचालकों के लिए, अपमिश्रित सहित, सत्य होता है।
  • 3n-प्रकार अर्धचालक पंचसंयोजी अशुद्धियों (As, Sb, P) से बनते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक वाहक होते हैं; p-प्रकार अर्धचालक त्रिसंयोजी अशुद्धियों (B, Al, In) से बनते हैं जिनमें छिद्र बहुसंख्यक वाहक होते हैं।
  • 4p-n संधि में अवक्षय क्षेत्र और अंतर्निहित अवरोध विभव विकसित होता है; अग्र अभिनति अवरोध को कम करती है (mA में धारा) जबकि पश्च अभिनति इसे बढ़ाती है (μA में धारा)।
  • 5सिलिकॉन डायोड के लिए देहली (कट-इन) वोल्टेज ~0.7 V है; पश्च अभिनति में भंजन वोल्टेज (Vbr) पर धारा में तीव्र वृद्धि होती है।