विज्ञान • कक्षा 7

विज्ञान (जिज्ञासा)

NCERT पाठ्यपुस्तक12 अध्याय

अध्याय नोट्स

विज्ञान (जिज्ञासा) में आप क्या सीखेंगे

विज्ञान (जिज्ञासा) का त्वरित रिवीज़न मैप — हर अध्याय का मूल विचार और पाँच मुख्य बातें। पूरा NCERT PDF और विस्तृत नोट्स पढ़ने के लिए किसी भी अध्याय पर टैप करें।

01

विज्ञान का निरंतर बढ़ता संसार

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 1, "विज्ञान का निरंतर बढ़ता संसार", विज्ञान को तथ्यों के संग्रह की बजाय जिज्ञासा, प्रश्न और अन्वेषण की एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है और वर्ष भर के प्रमुख विषयों — पदार्थों के गुणधर्म, विद्युत परिपथ, धातु-अधातु, परिवर्तन, ऊष्मा, जल-चक्र, जीवन-प्रक्रम, समय-मापन, प्रकाश-छाया और पृथ्वी-चंद्रमा-सूर्य की गतियों — का संक्षेप में परिचय देता है।

  • 1विज्ञान तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि जिज्ञासा और प्रश्न पूछने को प्रोत्साहित करने वाली सोचने की एक विधि है।
  • 2कक्षा 7 में गहरे प्रश्न पूछे जाएँगे — यह संसार कैसे चलता है? घटनाएँ ऐसे ही क्यों होती हैं? प्रकृति के प्रतिरूप क्या सिखाते हैं?
  • 3पदार्थों के गुणधर्म विषय में जाना जाएगा — कुछ फल खट्टे क्यों होते हैं और वर्दी पर लगे हल्दी के दाग धोने पर क्या होता है।
  • 4विद्युत परिपथ में बैटरी, तार और बल्ब के साथ प्रयोग करके पदार्थों को धातु और अधातु में वर्गीकृत करना सीखेंगे।
  • 5परिवर्तन एक प्रमुख विषय है — कुछ उत्क्रमणीय (बर्फ पिघलना) और कुछ अनुत्क्रमणीय (बैटरी का समाप्त होना, फल का पकना, चट्टान का टूटना)।
02

अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 2, "अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन", विद्यार्थियों को यह सिखाता है कि लिटमस, लाल गुलाब का अर्क, हल्दी और प्याज जैसे प्राकृतिक सूचकों का उपयोग करके पदार्थों की अम्लीय, क्षारीय या उदासीन प्रकृति की पहचान कैसे की जाए।

  • 1अम्लीय पदार्थ नीले लिटमस पत्र को लाल कर देते हैं; क्षारीय पदार्थ लाल लिटमस पत्र को नीला कर देते हैं; उदासीन पदार्थ दोनों ही प्रकार के लिटमस को प्रभावित नहीं करते।
  • 2लिटमस लाइकेन से प्राप्त एक प्राकृतिक पदार्थ है; यह नीले और लाल — दो रूपों में मिलता है तथा अम्ल-क्षार सूचक कहलाता है।
  • 3अम्लीय पदार्थ (नींबू का रस, आँवले का रस, इमली का पानी, सिरका) स्वाद में खट्टे होते हैं; क्षारीय पदार्थ (बेकिंग सोडा, चूने का पानी) छूने पर चिकने होते हैं।
  • 4लाल गुलाब का अर्क एक प्राकृतिक सूचक है — अम्लीय विलयन में लाल और क्षारीय विलयन में हरा होता है।
  • 5हल्दी-पत्र क्षारीय विलयन में लाल हो जाता है, परंतु अम्लीय या उदासीन विलयन में रंग नहीं बदलता — इसलिए यह अम्लीय और उदासीन पदार्थों में अंतर नहीं कर सकता।
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विद्युत परिपथ एवं उनके घटक

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 3, "विद्युत परिपथ एवं उनके घटक", विद्युत के विभिन्न उपयोगों और एक सरल विद्युत परिपथ के घटकों — सेल, बैटरी, तापदीप्त लैंप, एल.ई.डी., स्विच और तारों — का परिचय देता है तथा यह सिखाता है कि पदार्थों को विद्युत के सुचालक या कुचालक के रूप में कैसे पहचाना जाए।

  • 1विद्युत सेल — ऊर्जा का सुवाह्य स्रोत; दो सिरे होते हैं: धनात्मक (+) सिरा (धातु की टोपी) और ऋणात्मक (–) सिरा (धातु की चकती)।
  • 2बैटरी — दो या दो से अधिक सेलों का श्रेणी संयोजन; एक सेल का धनात्मक सिरा अगले सेल के ऋणात्मक सिरे से जुड़ता है।
  • 3तापदीप्त लैंप — काँच के बल्ब के भीतर पतला तंतु धारा प्रवाहित होने पर गरम होकर प्रकाश देता है; तंतु टूटने पर लैंप फ्यूज हो जाता है।
  • 4एल.ई.डी. — तंतु नहीं होता; इसमें ध्रुवता होती है — लंबा तार धनात्मक और छोटा तार ऋणात्मक सिरा होता है; धारा केवल एक दिशा में प्रवाहित होती है।
  • 5विद्युत परिपथ — धारा के प्रवाह के लिए संपूरित पथ आवश्यक है; धारा की दिशा सदैव सेल के धनात्मक से ऋणात्मक सिरे की ओर होती है।
04

धातुओं और अधातुओं का संसार

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 4, "धातुओं और अधातुओं का संसार", विद्यार्थियों को धातुओं और अधातुओं में अंतर करना सिखाता है — इसमें आघातवर्धनीयता, तन्यता, ध्वानिकता, ऊष्मा एवं विद्युत चालन जैसे पाँच प्रमुख भौतिक गुणधर्मों की जाँच की जाती है और यह भी बताया जाता है कि वायु और जल के संपर्क में आने पर लोहे पर जंग तथा ताँबे पर संक्षारण कैसे होता है।

  • 1धातुएँ (ताँबा, ऐलुमिनियम, लोहा) द्युतिमय, कठोर, आघातवर्धनीय और तन्य होती हैं; अधातुएँ (कोयला, सल्फर) द्युतिहीन और भंगुर होती हैं।
  • 2आघातवर्धनीयता — पीटकर पतली चादर बनाने का गुण; सोना और चाँदी सर्वाधिक आघातवर्धनीय हैं; मिठाइयों पर चाँदी का वर्क और खाद्य वस्तुओं पर ऐलुमिनियम पत्रक इसके उदाहरण हैं।
  • 3तन्यता — तार में खींचे जाने का गुण; सोना इतना तन्य है कि एक ग्राम सोने से 2 किलोमीटर लंबा तार खींचा जा सकता है।
  • 4ध्वानिकता — धातुओं का वह गुण जिससे वे ठनकने पर निनाद ध्वनि उत्पन्न करती हैं; अधातुएँ (कोयला, लकड़ी) हल्की ध्वनि उत्पन्न करती हैं। विद्यालय की घंटी और घुँघरुओं की ध्वनि इसी कारण होती है।
  • 5धातुएँ ऊष्मा और विद्युत की सुचालक होती हैं; अधातुएँ सामान्यतः कुचालक — इसीलिए भोजन पकाने के पात्र धातु के और उनके हत्थे लकड़ी के बनाए जाते हैं।
05

हमारे आस-पास के परिवर्तन: भौतिक एवं रासायनिक

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 5, "हमारे आस-पास के परिवर्तन: भौतिक एवं रासायनिक", भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों में अंतर करना सिखाता है, दहन की अग्नि-त्रिकोण अवधारणा, जंग लगना, प्रत्यावर्ती एवं अप्रत्यावर्ती परिवर्तन, तथा प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे अपक्षय और अपरदन को समझाता है।

  • 1भौतिक परिवर्तन में केवल पदार्थ के भौतिक गुण (आकार, आमाप, अवस्था) बदलते हैं; कोई नया पदार्थ नहीं बनता। उदाहरण: कागज मोड़ना, गुब्बारा फुलाना, बर्फ पिघलना।
  • 2रासायनिक परिवर्तन में एक या अधिक नए पदार्थ बनते हैं। उदाहरण: चूने के पानी में साँस छोड़ने पर वह दूधिया हो जाता है; सिरके में बेकिंग सोडा मिलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है।
  • 3चूने के पानी का परीक्षण कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति जाँचने के लिए किया जाता है — CO₂ की उपस्थिति में चूना पानी दूधिया हो जाता है।
  • 4दहन वह रासायनिक अभिक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कर ऊष्मा एवं/या प्रकाश उत्पन्न करता है। लकड़ी, कागज, कपास और मिट्टी का तेल दहनशील पदार्थों के उदाहरण हैं।
  • 5दहन के लिए तीन शर्तें (अग्नि-त्रिकोण) आवश्यक हैं: दहनशील पदार्थ (ईंधन), ऑक्सीजन, तथा ईंधन को उसके प्रज्वलन तापमान तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त ऊष्मा।
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वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था: किशोरावस्था

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 6, "वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था: किशोरावस्था", किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक, संवेगात्मक और व्यवहारगत परिवर्तनों को समझाता है, यौवनारंभ, द्वितीयक लैंगिक विशेषताओं, माहवारी, पोषण, स्वच्छता और हानिकारक पदार्थों से दूरी रखने की जानकारी देता है।

  • 1किशोरावस्था सामान्यतः लगभग 10 वर्ष की आयु से आरंभ होकर 19 वर्ष की आयु तक बनी रहती है; यह बाल्यावस्था और वयस्क-अवस्था के बीच विकास की अवस्था है।
  • 2किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तनों में लंबाई और भार में वृद्धि, लड़कों में चौड़े कंधे, लड़कियों में स्तन-विकास, वाक्-यंत्र वृद्धि के कारण आवाज में परिवर्तन, चेहरे और शरीर पर बाल, तथा त्वचा के तैलीय स्रावों में वृद्धि से मुहाँसे शामिल हैं।
  • 3द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ — जैसे लड़कों में आवाज भारी होना और चेहरे पर बाल उगना, और लड़कियों में स्तन-विकास — यह दर्शाती हैं कि शरीर वयस्क-अवस्था के लिए तैयार हो रहा है; ये यौवनारंभ को चिह्नित करती हैं।
  • 4यौवनारंभ वह अवस्था है जिसमें किशोर के शरीर में बाह्य और आंतरिक परिवर्तन होते हैं जिनसे वह जनन करने में सक्षम होता है।
  • 5लड़कियों में ऋतु चक्र सामान्यतः प्रत्येक 28-30 दिन (स्वस्थ सीमा 21-35 दिन) में आता है; माहवारी चरण तीन से सात दिन तक चलता है और यह यौवनारंभ पर आरंभ होकर 45-55 वर्ष की आयु पर स्वाभाविक रूप से बंद हो जाता है।
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प्रकृति में ऊष्मा का स्थानांतरण

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 7, "प्रकृति में ऊष्मा का स्थानांतरण", ऊष्मा स्थानांतरण की तीन प्रक्रियाओं — चालन, संवहन और विकिरण — को समझाता है तथा इन्हें स्थल समीर-समुद्र समीर, जल-चक्र, जल-अनुप्रवेश और भूजल-भंडारण जैसी वास्तविक प्राकृतिक परिघटनाओं से जोड़ता है।

  • 1चालन ऊष्मा का वह स्थानांतरण है जिसमें किसी वस्तु के गरम भाग से ठंडे भाग में स्पर्श में रहने वाले कणों के माध्यम से ऊष्मा स्थानांतरित होती है; कण स्वयं अपने स्थान पर ही स्थिर रहते हैं।
  • 2ऊष्मा को आसानी से संचरित होने देने वाले पदार्थ ऊष्मा के सुचालक कहलाते हैं (जैसे ऐलुमिनियम और लोहा); जो पदार्थ ऊष्मा प्रवाह को रोकते हैं वे कुचालक या ऊष्मारोधी कहलाते हैं (जैसे काँच, लकड़ी, मृदा, चीनी मिट्टी और वायु)।
  • 3ऊनी वस्त्र अपने रोमछिद्रों में वायु को रोकते हैं; वायु ऊष्मा की कुचालक होने के कारण शरीर से ऊष्मा के नुकसान को कम करती है और हमें गर्म रखती है।
  • 4संवहन में द्रव या गैसों के कणों की वास्तविक गति से ऊष्मा स्थानांतरण होता है। गरम होने पर द्रव या गैस फैलती है, हल्की होकर ऊपर उठती है और ठंडी भारी द्रव/गैस उसकी जगह लेती है।
  • 5स्थल जल की अपेक्षा तेजी से गरम और ठंडा होता है। दिन में स्थल के ऊपर गरम हवा उठती है और समुद्र से ठंडी हवा स्थल की ओर आती है (समुद्र समीर); रात में प्रक्रिया उलट जाती है और स्थल समीर चलती है।
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समय एवं गति का मापन

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 8, "समय एवं गति का मापन", प्राचीन समय-मापन यंत्रों (धूप-घड़ी, जल-घड़ी, रेत-घड़ी) से लोलक-घड़ी और परमाणु घड़ियों तक की यात्रा करता है, तथा चाल, औसत चाल और एकसमान एवं असमान रैखिक गति की अवधारणाएँ प्रस्तुत करता है।

  • 1प्राचीन समय-मापन यंत्रों में धूप-घड़ी (परछाई की स्थिति), जल-घड़ी (जल प्रवाह), रेत-घड़ी (एक बल्ब से दूसरे में रेत का प्रवाह) और मोमबत्ती-घड़ी (अंशांकित मोमबत्ती) शामिल थे।
  • 2भारत का घटिका-यंत्र एक डूबने वाले कटोरे प्रकार की जल-घड़ी थी जिसका उल्लेख आर्यभट्ट ने पहली बार किया था। 24 मिनट में भरकर डूबती थी और एक दिन 60 घटियों में बाँटा जाता था।
  • 3विश्व की सबसे बड़ी पत्थर की धूप-घड़ी 'सम्राट यंत्र' जयपुर के जंतर-मंतर (यूनेस्को विश्व धरोहर) में है; इसकी 27 मीटर ऊँचाई से इसकी छाया प्रत्येक सेकंड में लगभग 1 मिलीमीटर सरकती है और 2 सेकंड तक की अल्पावधि माप सकती है।
  • 4सरल लोलक में एक धात्विक गोलक धागे पर लटका होता है; इसका दोलनकाल (एक पूर्ण दोलन का समय) लोलक की लंबाई पर निर्भर करता है, गोलक के द्रव्यमान पर नहीं।
  • 5लोलक घड़ी का आविष्कार 1656 में हुआ और 1657 में क्रिश्चियन हाइगेन्स (1629-1695) ने इसे पेटेंट किया; गैलीलियो के लोलक प्रयोगों से प्रेरित होकर।
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जंतुओं में जैव प्रक्रम

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 9, "जंतुओं में जैव प्रक्रम", पोषण और श्वसन जैसे जैव प्रक्रमों का विस्तृत अध्ययन करता है — मानव पाचन तंत्र की आहार नाल (मुख से गुदा तक) और श्वसन तंत्र (फेफड़े, कूपिकाएँ) को केंद्र में रखते हुए विभिन्न जंतुओं में इन प्रक्रमों की तुलना करता है।

  • 1जैव प्रक्रम (पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, जनन) सजीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक हैं; इस अध्याय में मुख्यतः पोषण और श्वसन का अध्ययन है।
  • 2मानव आहार नाल मुख से आरंभ होकर गुदा पर समाप्त होती है; इसके अंग हैं — मुख, ग्रासनली, आमाशय, क्षुद्रांत्र, बृहदांत्र, मलाशय और गुदा।
  • 3लार में पाचक रस होता है जो मंड (स्टार्च) को शर्करा में बदलता है — आयोडीन परीक्षण से पुष्टि होती है: बिना चबाए चावल में नीला-काला रंग, चबाए चावल में परिवर्तन नहीं।
  • 4आमाशय पाचक रस, अम्ल और श्लेष्म स्रावित करता है; अम्ल प्रोटीन पाचन में सहायता करता है और हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है; श्लेष्म आमाशय की भित्ति की रक्षा करता है।
  • 5क्षुद्रांत्र (लगभग 6 मीटर लंबी, आहार नाल का सबसे लंबा भाग) में यकृत से पित्त (वसा को तोड़ता है, अम्ल को उदासीन करता है) और अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा का पाचन) पहुँचता है; इसकी आंतरिक भित्ति पर अंगुलीनुमा उभार पोषक अवशोषण की सतह बढ़ाते हैं।
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पादपों में जैव प्रक्रम

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 10, "पादपों में जैव प्रक्रम", बताता है कि पादप प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन कैसे बनाते हैं, जाइलम और फ्लोएम द्वारा जल व भोजन का परिवहन कैसे करते हैं, और हरे व अहरित सभी भागों में श्वसन किस प्रकार होता है।

  • 1पादपों की वृद्धि के लिए सूर्य का प्रकाश और जल दोनों आवश्यक हैं — सूर्य-प्रकाश और जल वाले गमले में पौधा सबसे अच्छा बढ़ता है; अंधेरे में रखा पौधा सबसे कम बढ़ता है।
  • 2पत्तियाँ पादप की 'भोजन कारखाना' हैं; उनमें पर्णहरित (क्लोरोफिल) नामक हरा वर्णक होता है जो सूर्य-प्रकाश को कुशलतापूर्वक ग्रहण करता है।
  • 3प्रकाश-संश्लेषण: कार्बन डाइऑक्साइड + जल → (सूर्य-प्रकाश / क्लोरोफिल) → ग्लूकोज + ऑक्सीजन।
  • 4मंड (स्टार्च) का परीक्षण आयोडीन विलयन से होता है — नीला-काला रंग मंड की उपस्थिति दर्शाता है; परीक्षण से पहले पत्ती को अल्कोहल में उबालकर विरंजित करना पड़ता है।
  • 5केवल प्रकाश में रखी हरी (क्लोरोफिल-युक्त) पत्तियों में मंड बनता है; अंधेरे में रखी पत्तियों में नहीं।
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प्रकाश: छाया एवं परावर्तन

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 11, "प्रकाश: छाया एवं परावर्तन", यह समझाता है कि प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है, पारदर्शी-अपारदर्शी पदार्थ छाया कैसे बनाते हैं, और समतल दर्पण में परावर्तन, पार्श्व-प्रतिलोमन तथा सुरंगदर्शी (पेरिस्कोप) एवं बहुरूपदर्शी (कैलाइडोस्कोप) जैसे प्रकाशीय उपकरण कैसे काम करते हैं।

  • 1दीप्त पिंड स्वयं प्रकाश उत्सर्जित करते हैं (जैसे सूर्य, तारे, बिजली, जुगनू); अदीप्त पिंड जैसे चंद्रमा केवल परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं।
  • 2प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है — माचिस-डिब्बी छिद्र क्रियाकलाप और मुड़े पाइप क्रियाकलाप से सिद्ध।
  • 3पारदर्शी पदार्थ से प्रकाश लगभग पूरी तरह, पारभासी से आंशिक रूप से और अपारदर्शी से बिल्कुल नहीं गुजरता।
  • 4छाया निर्माण के लिए तीन चीजें अनिवार्य हैं: प्रकाश-स्रोत, अपारदर्शी वस्तु और पर्दा।
  • 5अपारदर्शी वस्तु गहरी छाया, पारभासी वस्तु हल्की छाया बनाती है; अपारदर्शी वस्तु का रंग बदलने से छाया का रंग नहीं बदलता।
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पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य

कक्षा 7 विज्ञान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (जिज्ञासा) का अध्याय 12, "पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य", बताता है कि पृथ्वी का घूर्णन (लगभग 24 घंटे) किस प्रकार दिन-रात का चक्र बनाता है, परिक्रमण (लगभग 365 दिन) तथा अक्ष का झुकाव ऋतुएँ कैसे उत्पन्न करते हैं, और सूर्य-ग्रहण तथा चंद्र-ग्रहण कब होते हैं।

  • 1पृथ्वी अपनी धुरी (उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से गुजरने वाली काल्पनिक रेखा) पर लगभग 24 घंटे में एक घूर्णन पूरा करती है।
  • 2उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखने पर पृथ्वी वामावर्त दिशा में अर्थात पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
  • 3पृथ्वी के पश्चिम-से-पूर्व घूर्णन के कारण सूर्य पूर्व में उदित, आकाश में गतिमान और पश्चिम में अस्त होता प्रतीत होता है; इसी कारण चंद्रमा और तारे भी पूर्व से उदित और पश्चिम में अस्त होते प्रतीत होते हैं।
  • 4पृथ्वी का घूर्णन-अक्ष ध्रुव-तारे के बहुत निकट इशारा करता है इसलिए ध्रुव-तारा लगभग स्थिर दिखता है, जबकि अन्य सभी तारे इसके चारों ओर घूमते प्रतीत होते हैं।
  • 5पृथ्वी लगभग वृत्ताकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करती है और लगभग 365 दिन 6 घंटे में एक परिक्रमा पूरी करती है।